बुधवार, 15 जनवरी 2020
मंगलवार, 14 जनवरी 2020
गुरुवार, 9 जनवरी 2020
होम्योपैथिक से बच्चों का उपचार
होम्योपैथिक
से बच्चों का उपचार
होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति को लक्षण विधान
चिकित्सा पद्धति में कहते है, इस चिकित्सा पद्धति में किसी रोग का उपचार न कर
चिकित्सक, लक्षणों का उपचार करते है ।
छोटे बच्चों के मामले में कई प्रकार के ऐसे
लक्षण होते है जिन्हे रोग की श्रेणी में नही रखा जाता , जैसे बच्चे का रात भर
रोना दिन भर सोना , या इसके विपरीत बच्चे का दिन भर रोना रात को सोना , बच्चा मॉ
की गोद में ही शांत रहे नीचे उतारते ही रोने लगे , सामानो को तोडता फेकता हो ,
क्रूर स्वाभाव का, क्रोधी स्वाभाव , हकलाना, तोतलाना, या निश्चित उम्र होने पर
शारीरिक विकास न होना ,बच्च्ो का चलना व बोलना देर में सीखना,मुंह से लार टपकते
रहना, मूर्खो की तरह व्यवहार करना आदि ।
इस प्रकार के लक्षणों का उपचार होम्योपैथिक से किया जा सकता है एंव इसके बहुत ही
अच्छे परिणाम मिलते है ।
बच्चों के इस प्रकार के लक्षणों में नीचे
दी गयी दवाओं का सफलतापूर्वक उपयोग किया जा सकता है ।
बच्चों
का बोलना चलना देर से सीखना :-
1-बच्चों का देर से बोलना सीखना (नेट्रम म्यूर) :- यदि बच्चा देर से बोलना सीखे तो नेट्रम
म्यूर दवा का प्रयोग किया जा सकता है । इस का रोगी सहानुभूति से क्रोधित हो जाता
है पुष्टीकारक भोजन करने पर भी रोगी दुर्बल होते जाता है, शरीर ऊपर से नीचे की
तरफ सूखता है । इसके रोगी को नमक के प्रति विशेष चाह होती है । इस दवा का असर गहरा
परन्तु दर से होता है, इस दवा को 6 या 30
पोटेंशी में दिन में तीन बार देना चाहिये ।
2-बच्चा देर से चलना सीखे (कैल्केरिया कार्ब) :- यदि बच्चा देर से चलना सीखे तो कैल्केरिया
कार्ब दवा देना चाहिये वैसे तो कैल्केरिया कार्ब का मेरूदण्ड, टॉगे पतली और टेडी
होने के साथ शरीर स्थूल मोटा ,हडिडीया कमजोर ,चलने फिरने में उसे तकलीफ होती है
बच्चा दौड धूप नही कर सकता ,हर समय थका थका सा रहता है जहॉ बैठाल दो मिट्टी के
माधव की तरह बैठा रहता है , शरीर ठंडा परन्तु सोते समय पसीना आना जिससे तकिया
भींग जाता है यह कैल्केरिया का विलक्षण लक्षण है ठंडे कमरे में भी पसीना आता है
जबकि ठंडे कमरे में रोकी को पसीना नही आना चाहिये रोगी के पैर वर्फ की तरह ठंडे
होते है एंव शरीर से खटटी बू आती है परन्तु बच्चों का देर से चलना सीखने पर इसका
प्रयोग करना चाहिये । प्रारम्भ में इस दवा को 12 या 30 पोटेंशी में कुछ दिनो तक
देना उचित है । इसकी उच्च शक्ति का प्रयोग भी आवश्यकतानुसार किया जा सकता है ।
3-बच्चा बोलना एंव चलना दोना देर से सीखे (एकारिकस) :- बच्चा यदि चलना एंव बोलना दोनों देर से
सीखता हो तो उसे एकारिकस दबा देना चाहिये । इस औषधि के मुख्य लक्षण रोगी के अंगों
का फडकना,मॉसपेशियों का थरथराना या कॉपना,शरीर में चींटी सी चलने की अनुभूति होना
है ।
रात में रोना दिन में सोना
4-बच्चों का रात में रोना दिन में सोना (जेलपा) :- यदि बच्चा रात में
रोता हो और दिन में सो जाता हो व शान्त खेलता रहता हो तो ऐसे बच्चों को जेलपा
देना चाहिये , इसका बच्चा दिन भर तो अच्छी तरह से खेलता रहता है परन्तु रात्री
में चिल्लाता है या रोता है डॉ सत्यवृत जी ने लिखा है कि यह बच्चों में पेट की
गडबडी के कारण ऐसा होता है ,बच्चो को पेट र्दद और दस्त की भी शिकायत हो सकती है
। इस परेशानी में 3, 6,12 पोटेंशी दवा में
दिन में तीन बार देना चाहिये ।
(5) बच्चे का रात भर रोना दिन भर खेलना (सोरिनम) :-इस मामले में सोरिनम लाईको से उल्टा है ।
सोरिनम का बच्चा दिन भर खेलता है, परन्तु रात में रोता है । औषधि के निर्देशित लक्षण है इसके शरीर मल मूत्र
,पस तथा पसीने या शरीर से निकलने वाले स्त्रावों से बुरी गंध, सडे मॉस या अण्डे
जैसी बदबू आती है । रोगी की त्वचा गंदी मैली होती है उसे कितना भी नहलाओं धुलाओं
परन्तु वह साफ नही दिखती , रोगी नहाने से घबराता है , त्वचा खुरदरी, जगह जगह फटी
हुई , त्वचा में दरारें जिसमें से रक्त आसानी से निकलता है ,खोपडी चहरे पर एग्जीमा
,बिस्तर में रोगी को खुजली, गर्म मौसम में भी रोगी को ठंड महसूस होती है, उसी
ठंडी हवा सहन नही होती । इस दवा की रोग स्थिति के अनुसार 200 या 1-एम पोटेंसी की
दवा होम्यो सिद्धान्त के अनुसार देना चाहिये । 30 पोटेंसी की दवाओं से भी उचित
परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ।
6-बच्चा रात भर रोता है और दिन में ठीक
रहता है (रियूम) :- यदि बच्चा रात भर रोता हो एंव दिन में ठीक रहता हो
तो ऐसे बच्चों को रियूम देना चाहिये (डॉ सत्यवृत) । इसके बच्च्ो के शरीर
से खट्टी बदबू तथा खट्टापन होता बच्चे के शरीर व हर अंग से पसीना आता है उसमें
खट्टी बदबू होती है । इसके बच्चे को संतुष्ट करना कठिन होता है यह तेज मिजाज का
एंव अधिर होता है ।
7- बच्चा दिन में
खेलता है लेकिन रात्री में रोता चिल्लाता है (साईप्रिपेडियम ) :- बच्चा दिन में तो अच्छी तरह से हॅसता
खेलता रहता है, लेकिन रात होते ही रोने चिल्लाने लगता है, बच्चा रात्री में उठ
कर एकाएक खेलने लग जाता है , हॅसने लगता है बच्चों में नींद की कमी पाई जाती है ,
यह दवा नीद के लिये भी उपयोगी है । इसके मूल अर्क को दस दस बूद दिन में तीन बार
कुछ दिनों तक देना चाहिये परन्तु 3,6,12 तथा 30 पोटेंसी में परिणाम बहुत अच्छे
मिलते है इस दवा को दिन में तीन बार दिया जा सकता है ।
बच्चा दिन में रोता है एंव रात्रि में सोता
8-बच्चा दिन में रोता है एंव रात्रि में सोता है (लाईकोपोडियम):-
यदि बच्चा दिन में रोता रहता है एंव
रात्रि में सोता रहता हो तो ऐसे बच्चों को लाईकोपोडियम दबा देना चाहिये । इसका
बच्चा इतना स्नायु प्रधान होता है कि वह जरा सी खुशी पर भावुक हो जाता है उसकी
ऑखों से ऑसू आ जाते है ,इसको ठंड बहुत लगती है ,सोते हुऐ बिस्तर में पेशाब कर
देना ,इसके बच्चे की शारीरिक संरचना दुबला पतला,पीला चहरा,पिचके हुऐ गाल , अपनी
उम्र से अधिक दिखना , बच्चे का सिर बडा और ठिंगना ,शरीर ऊपर से नीचे की तरफ
क्षीण् होता हुआ ।
9-बच्चों का चौक कर उठना (बोरेक्स) :- यदि बच्चा चौक कर उठता हो तो उसे बोरेक्स
देना चाहिये । बोरेक्स का बच्चा बहुत ही स्नायविक होता है, जरा से में चौक उठता
है , यदि मॉ बच्चे को गोद से उतार कर पलंग पर लिटाती है तो वह चौक जाता है । इस
दवा को 3, 6,12 तथा 30 पोटेंसी में देने से अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते
है ।
10-क्षूठ मूठ के रोने का उपक्रम (स्टेफिग्रेसिया):- यदि बच्चा
क्षूठ मूठ के रोने का उपक्रम करे परन्तु ऑसू न आये तो ऐसी स्थितियों में उसे स्टेफिग्रेसिया
30 या 200 शक्ति में देने से उसकी यह आदत ठीक हो जाती है ।
इस दवा के
निर्देशित लक्षणों में अपमान से क्रोध का घूंट पीने से जो भी रोग उत्पन्न होते
हो, यह दवा बच्चों के मन पर भी प्रभाव
करती है, बच्चों के क्रोध में कैमोमिला तथा स्टेफिग्रेसिया का प्रयोग किया जाता
है ,बच्चों के दॉत काले पड जाते है उन पर काली रेखायें दिखती है । इस दवा को 3, 6,12 तथा 30 पोटेंसी में
देने से अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । रोग स्थिति के अनुसार इसकी उच्च
शक्ति का प्रयोग भी किया जा सकता है ।
-हकलाना या तोतलाना
11-हकलाना एंव तोतलाना (स्ट्रामोनियम-धतूरा):- यह दवा धतुरे से बनाई जाती है धतूरा खाने
पर रोगी को शब्द उच्चारण करने में देर तक प्रयास करना पडता है, यह स्थिति हकलाने
एंव तोतलाने जैसी होती है इसी लिये लिये हकलाने एंव तोतलाने की स्थिति में इस दवा
का प्रयोग करना चाहिये । निर्देशानुसार 30 शक्ति में दिन में तीन बार प्रयोग करना
चाहिये परन्तु अनुभवों को ज्ञात हुआ है कि इसकी 200 शक्ति की दवा सप्ताह में एक
बार या फिर आवश्यकतानुसार कुछ अन्तरालो से देने पर भी अच्छे परिणाम मिलते है
कुछ गृन्थकारो ने 1-एम शक्ति की अनुशंसा की है । हमने भी कई ऐसे बच्चे जो हकलाते
व तोतलाते थे उन्हे इसकी 200 शक्ति की दवा तीन तीन दिन के अन्तर से दिया एंव हमे
इसके बहुत ही अच्छे आशानुरूप परिणाम देखने को मिले है ।
12- हकलाना एंव तोतलाना (कैनाबिस इंडिका- भांग):- कैनाबिस इंडिका को हम भांग कहते है इसे व्यक्ति
नशा करने के लिये उपयोग करते है इसके सेवन से भी व्यक्ति एक वाक्य को शुरू करते
ही आगे का वाक्य भूल जाता है उसे वाक्यों को बोलने में या शब्दों को बोलने में
दिमाक पर काफी जोर लगाना पडता है इस स्थिति में वह हकलाता है या कभी कभी तोतलाने
लगता है । निर्देशित प्रबल मानसिक लक्षणों में वह मरे हुऐ आदमियों के सपने देखता
है और हर वक्त डरा रहता है लगातार सिर हिलाता एंव बकवास करता रहता है । हमने
हकलाने व तोतलाने के कई प्रकरणों में इस दवा को मात्र हकलाने व तोतलाने के लक्षणों
पर प्रयोग किया एंव हमे आशानुरूप परिणाम मिले है । इस दवा को 30 एंव 200 शक्ति में
प्रयोग किया जा सकता है ।
13-कैनेबिस (सैटाइवा- गांजा):- इस दवा के लक्षण भी हकलाने व तोतलाने की समस्या पर हूबहू मिलते कैनाबिस इंडिका से मिलते है , इसका
रोगी भी वाक्य को शुरू करते ही आगे के वाक्यों को भूल जाता है अत: हकलाने व
तोतलाने पर उक्त दोनो दवाओं में से किसी भी एक दवा का प्रयोग किया जा सकता है
इसके रोगी के विशिष्ट लक्षण है रोगी कपडे का स्पर्श सहन नही कर सकता । इस दवा को
30 एंव 200 शक्ति में प्रयोग किया जा सकता है ।
14- तोतलाने की अवस्था में (कास्टिकम):-
तोतलाने की अवस्था में जिसमें दाहिनी जीभ अधिक प्रभावित हो एंव गले की आवाज कर्कश
रहती हो , या फिर तोतलाना पक्षाधात की वजह से हो तो इस दवा का प्रयोग करना चाहिये
, इस दवा का प्रयोग रोगावस्था के अनुसार 200 या 1एम्ा शक्ति का प्रयोग निर्देशित अंतराल से करना चाहिये ,
कुछ चिकित्सक निम्न शक्ति की अनुशंसा करते है जैसे 6 या 30 पोटेंसी की मात्रा
दिन में तीन बार एक या दो सप्ताह प्रयोग करने पर उचित परिणाम परिलक्ष्ति होने
लगते है ।
15- वृद्ध स्त्रीयो के तोतलाने पर (बोविस्टा):- यह दवा वृद्ध स्त्रीयों के तोतलाने पर
एंव अन्य व्यक्तियों के तोतलाने पर भी उपयोगी है । इस दवा को 30 एंव 200 शक्ति
में प्रयोग किया जा सकता है ।
16-जीभ
मोटी होने के कारण हकलाता हो (जैल्सियम) :- शरीर की समस्त मॉसपेशीयों में सून्नता जींभ की क्रिया में
बाधा पड जाना उसका काम ठीक से न हो पाना अंग उसकी इक्च्छा से कार्य न करते हो,
सम्पूर्ण शरीर की शिथिलता के कारण यदि जीभ हकलाती हो तो इस दवा का प्रयोग किया जा
सकता है, कुछ चिकित्सकों का अभिमत है कि जींभ मोटी होने के कारण हकलाहट होने पर
भी यह दवा उपयोगी है । जैल्सियम 30 शक्ति की दवा का प्रयोग नियमित कुछ दिनों तक
करना चाहिये । आवश्यकतानुसार इसकी उच्च शक्ति का प्रयोग निर्देशित लक्षणों के
अनुसार किया जा सकता है ।
बच्चों के रोने एंव जिदद करने के उपक्रम
:-
17-बच्चों का अनावश्यक जिदद करना (कैमोमिला) :- यदि बच्चा अनावश्यक जिदद करता हो एंव
उसे गुस्सा आता हो तथा चिडचिडाता हो एंव जो भी चीजे दो उसे फेक देता हो तो उसे
कैमोमिला दवा देना चाहिये इससे अनावश्यक जिदद करने एंव चिडचिडाने तथा क्रोधित
होने की प्रवृति बदल जाती है । इस दवा को 30 शक्ति में दिन में तीन बार या उच्च
शक्ति में निर्देशानुसार प्रयोग करने से अच्छे परिणाम मिलते है ।
18-बच्चों
का गोद में धूमने के लिये जिदद करना (एन्टीमोनियम टार्ट) :- यदि बच्चा गोद में टंगा
रहता हो या गोद में धूमने के लिये जिदद करता हो , एंव किसी अपरिचित व्यक्ति
द्वारा देखने या छूने पर रोने लगता हो तो ऐसे बच्चों को एन्टीमोनियम टार्ट देना
चाहिये । इस दवा की 30 शक्ति या आवश्यकतानुसार
200 शक्ति की दवा का प्रयोग किया जा सकता है ।
19-हठी जिद्धी ,क्रोधि चिडचिडा ,चिल्लाना
व लाते मारना (सैनिक्युला):- यदि बच्चा हठी क्रोधि चिडचिडा ,चिल्लाता व लाते
मारता हो , किसी को छूने नही देता हो, एक क्षण में क्रोधित तो दूसरे ही क्षण में
जोर से हॅसने लगना, इन लक्षणों पर सैनिक्युला दबा का प्रयोग करना चाहिये । इस दवा
की 30 शक्ति या आवश्यकतानुसार 200 शक्ति की दवा का प्रयोग किया जा सकता है ।
20-बच्चा चालाक चंचल और विध्वस्क है चीजों को तोडता फोडता है
(टेरेंटुला )- यदि बच्चा चालाक विध्वस्क
है चीजों को तोडता फोडता है तो ऐसे बच्चो की दबा टेरेटुला होगी, 30 शक्ति या आवश्यकतानुसार 200 शक्ति की दवा
का प्रयोग किया जा सकता है ।
21-जिददी बच्चें
(एण्टिमोनियम क्रूडम):- बच्चे का अपरिचित व्यक्तियों द्वारा छूने या उसकी
तरफ देखने पर बच्चा रोने लगता है , बच्चा जिददी चिडचिडा होता है ,बच्चों को प्यास
का न लगना इन लक्षणों पर एण्टिम क्रूडम दवा दिया जाना चाहिये, 30
शक्ति या आवश्यकतानुसार 200 शक्ति या फिर इससे भी उच्च पोटेंसी का उपयोग किया जा
सकता है ।
22-बच्चों में चिडचिडापन (एन्टीमोनियम
टार्ट):- यदि बच्चों में चिडचिडापन हो तो ऐसी अवस्था में उन्हे एन्टीमोनियम टार्ट
देना उचित है ,इसके बच्चों में श्वास सम्बन्धित परेशानीया ,बच्चों की पसली
चलने पर यह उपयोगी है जबकि एण्टिमोनिय क्रूडम में पेट से सम्बन्धत समस्याये
होती है यह दोनों दवाये बच्चों के मामले में एक सी है जैसे बच्चे का किसी अपरचित
व्यक्ति के द्वारा छूने पर या उसकी तरफ देखने पर वह रोने लगता है बच्चा चिडचिडा
होता है खुली हवा पसंद करता है 30 शक्ति
या आवश्यकतानुसार 200 शक्ति की दवा का प्रयोग किया जा सकता है ।
डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल बी0 एच0 एम0
एस0,एम0डी0
धमार्थ
चिकित्सालय
बजाज शो रूम के सामने नर्मदा बाई स्कूल के
पास बण्डा रोड मकरोनिया सागर म0प्र0 मकरोनिय
मो-9300071924-9630309033
मानसिक विकलांग व्यक्तियों का उपचार होम्योपैथिक
मानसिक विकलांग व्यक्तियों का उपचार होम्योपैथिक
मानसिक विकलांग बच्चों में, कई
बच्चों के रोग लक्षण होम्योपैथिक लक्षणों से मिलते जुलते है चूंकि जैसाकि हम सभी
होम्योपैथिक चिकित्सक इस बात को अच्छी तरह से जानते है कि होम्योपैथिक में
किसी रोग का उपचार न होकर लक्षणों का उपचार किया जाता है । इससे कभी कभी लक्षणों
के आधार पर ऐसे मानसिक विकलांग बच्चों को होम्योपैथिक दवा देने से बडे ही अच्छे
परिणाम मिलते है । हमारी संस्था द्वारा मानसिक एंव बहुविकलाग बच्चों हेतु विशेष
स्कूल दिशा मानसिक विकलांग केन्द्र सागर म0प्र0 का संचालन किया जा रहा है । इस
विशेष स्कूल में छोटे छोटे दिव्यांग बच्चों को प्रवेश दिया जाता है । अत: ऐसे
दिब्यांग बच्चों में कई प्रकार की मानसिक व शारीरिक समस्यायें इस प्रकार होती
है जो सामान्य बच्चों में कम पाई जाती है ऐसे बच्चों के लक्षण भी बडे स्पष्ट
होते है जो प्रथम दृश्य ही पहचान लिये जाते है । जैसे कुछ बच्चों की मुंह से
लगातार लार का टपकते रहना ,हाथ पैर या गर्दन का हिलते रहना , कुछ बच्चे बडे
शर्मिले स्वाभाव के तो कुछ उदंण्ड प्रवृति के होते है । कुछ शांत स्वाभाव के तो
कुछ वाचाल शरारती होते है । इस प्रकार के लक्षणों का बारीकी से आवलोकन कर होम्योपैथिक
औषधियों का निर्वाचन किया जाये तो परिणाम बडे अच्छे व आशानुरूप मिलते है ।
1-बच्चों के
मुंह से लगातार लार टपकते रहना :- वैसे तो कई सामान्य बच्चों के
मुंह से लार टपकती रहती है परन्तु मानसिक विकलांग बच्चों में भी यह प्रवृति देखी
जाती है । मुंह से लार टपकने की इस प्रवृति में होम्योपैथिक में मार्कसाल दवा के
प्रयोग करने के निर्देश है ।
हमारी संस्था में एक बच्चे के
मुंह से लगातार लार टपकती रहती थी उस बच्चे को मार्कसाल 30 शक्ति में कुछ दिनों
तक लगातार प्रयोग करा गया इसका परिणाम यह हुआ कि पहले की अपेक्षा लार का गिरना कुछ
कम हुआ ,परन्तु पूरी तरह से ठीक न होने पर उसे मार्कसाल 200 शक्ति में तीन तीन
दिन के अन्तर से दिया गया । इस दवा के देने पर कुछ ही दिनों में लार का टपकना
पूरी तरह से बन्द हो गया परन्तु दबा के बन्द करते ही लार पुन्ा: टपकने लगती थी
परन्तु पहले की अपेक्षा कम थी , अत: उसे 1-एम शक्ति की एक खुराक दी गयी साथ ही यह
परिक्षण किया गया कि इस दवा के देने से कितने दिनों के अंतर से लार पुन: टपकी है
चूंकि पहले 200 शक्ति में यह दबा 3 दिन के अन्तर से देने पर दुसरे दिन लार टपकने
लगती थी । 1-एम शक्ति की दबा के देने से तीन से चार दिन के अन्तर से पुन: लार
टपकने लगती थी इस लिये इस दबा को तीन दिन के अन्तर से कुछ दिनों तक दिया गया । इस
दवा की 1- एम शक्ति का परिणाम यह हुआ कि उसके मुंह से लार टपकना करीब करीब बन्द
हो चुकी थी इसलिये दवा बन्द कर दी गयी दवा के बन्द करने पर पुन: पन्द्रह दिन के
अन्तर से लार टपकने लगी इसे देख कर उसे सी एम की एक मात्रा दी गयी इसके देने पर
लार का गिरना पूरी तरह से ठीक हो गया । परन्तु यहॉ पर एक दुसरा केश है जिसमें एक
सात आठ वर्ष के बच्चे की बुरी तरह से लगातार लार टपका करती थी उसे मार्कसाल 30
शाक्ति में लगातार एक माह तक बीच बीच में बन्द करते हुऐ पयोग कराया गया इसे बडे
ही अच्छे परिणाम मिले इस शक्ति की दबा के बाद उसे अन्य शक्ति की दवा देने की आवश्यकता
ही नही हुई । अत: हमारी संस्था में इस प्रकार के बच्चों के लार टपकने की प्रवृति
पर हम मार्कसाल दवा का प्रयोग करते है एंव इसके हमे बडे ही आशानुरूप परिणाम मिले
है ।
मुर्खो की
तरह व्यवहार :- वैसे तो मानसिक विकलांग बच्चे मंद बुद्ध होते है परन्तु यदि
बारीकी से देखा जाये तो मानसिक विकलाग बच्चे मंद बुद्धी के होते हुऐ भी उनमें
दूसरों से कुछ अलग करने की क्षमता होती है एंव उनका व्यवहार भी सामान्य बच्चों
से अलग होता है इसके बाद भी यदि सूक्ष्मता से आवलोकन करने पर आप पायेगे कि मंद
बुद्धी का होते हुऐ भी उसमें कुछ अलग है । परन्तु कुछ मंद बुद्धि बच्चे मुर्खो
का ऐसा व्यवहार करते है जो देखने पर एकदम समक्ष में आता है ऐसे बच्चों को
बैराईटा कार्ब 30 शक्ति में कुछ दिनों तक देना चाहिये । यह दबा होम्योपैथिक में मूर्खो की दवा कही जाती
है । इसका प्रयोग आवश्यकतानुसार एंव लक्षणों के आधार पर इसका चयन निम्नशक्ति से
करते हुऐ अधिकतम 200 शक्ति तक में किया जाना चाहिये । इस दवा के भी बडे अच्छे
परिणाम मिले है ।
याददास का कम
होना :- वैसे तो यह दबा होम्योपैथिक में याददाश के कम होने या भूलने
की प्रवृति में प्रयोग की जाती है मानसिक एंव बहुविकलांग बच्चों में प्राय: कुछ
बच्चों में भूलने या याददास कम होने की प्रवृतियॉ होती है ऐसे बच्चों को
एनाकार्डियम दवा 30 शक्ति में या इससे भी ऊची शक्ति में देना चाहिये इससे भूलने
एंव याददास के कम होने की बीमारी में लाभ होता है ।
बच्चा चंचल
विध्वस्क चीजों को तोडता फोडता हो :- बच्चा चंचल,चालाक एंव विध्वस्क चीजों को
तोडता फोडता है ऐसे बच्चों को टेरेटुला 30 शक्ति की या 200 शक्ति का प्रयोग करना
चाहिये ।
बच्चा अत्याधिक
शर्मिला हो :- यदि बच्चा अत्याधिक शर्मिला हो एंव अपने के छिपाता हो तो
ऐसे बच्चों को एन्टीमकूड ,हायोसाईमस तथा
बैराईटा कार्ब दबा का प्रयोग लक्षणानुसार करना चाहिये ।
मॉ से चिपटा
रहता हो :- कई बच्चों में ऐसे प्रवृतियॉ देखी जाती है जैसे वह अपनी मॉ
से ही चिपटा रहता है खेलने कूदने कम जाता है या फिर मॉ या पिता के पास ही चिपटे
रहना अधिक पंसद करता है इस प्रकार के लक्षणों पर पल्सेटेला ,विस्मिथ या बोरेक्स
जैसी दवाओं का चुनाव लक्षणों के अनुसार किया जा सकता है ।
बच्चा उदण्ड
कटखना या प्रचंड पागलपन करता हो :- यदि बच्चा उदण्ड कटखना या
प्रचंड पागलपन करता हो तो उसे बेलाडोना दिया जा सकता है । इस दबा की निम्नशक्ति
का प्रयोग प्रारम्भ में करना चाहिये ।
क्रोधि
चिडचिडा :- कई बच्चे क्रोधी चिडचिडे होते है ऐसे बच्चों को कैमोमिला
दवा देने से उनकी यह प्रवृति बदल जाती है ।
बच्चे का
सोकर घबराकर उठना :- बच्च सोकर घबराया उठता है एलूमिना के
मानसिक लक्षणों में बच्चा प्रात:काल जब सोकर उठता है तब घबराया हुआ होता है ।
(डॉ0सत्य)
अंगूठा चूसना :- कई बच्चों यहॉ तक की बडे
व्यक्तियों में भी अंमूठा चूसने की बुरी आदत देखी जाती है । इस प्रकार की आदत को
छुडाने में नेट्रम म्यूर 1 एम शक्ति की दबा का प्रयोग पन्द्रह दिनों या सात
दिनों के अन्तराल से करना चाहिये यह दवा
साधारण नमक को शक्तिकृत कर बनाई जाती है ।
बच्चों का देर से बोलना सीखना :- यदि
बच्चा देर से बोलना सीखे तो नेट्रम म्यूर दवा का प्रयोग किया जा सकता है ।
बच्चा देर से चलना सीखे :- यदि
बच्चा देर से चलना सीखे तो कैल्केरिया कार्ब दवा देना चाहिये वैसे तो कैल्केरिया
कार्ब दबा कम बुद्धि के बच्चों के लिये उपयोगी है परन्तु बच्चों का देर से चलना
सीखने पर इसका प्रयोग करना चाहिये ।
बच्चा बोलना एंव चलना दोना देर से सीखे :- बच्चा यदि चलना एंव बोलना दोनों देर से
सीखता हो तो उसे एकारिकस दबा देना चाहिये ।
बच्चों का चौक कर उठना :- यदि बच्चा चौक कर उठता हो तो उसे बोरेक्स देना चाहिये ।
बोरेक्स का बच्चा बहुत ही स्नायविक होता है,जरा से में चौक उठता है ,यदि मॉ बच्चे
को गोद से उतार कर पलंग पर लिटाती है तो वह चौक जाता है ।
बच्चों में चिडचिडापन:- यदि बच्चों
में चिडचिडापन हो तो ऐसी अवस्था में उन्हे एन्टीमोनियम टार्ट देना उचित है ।
हठी जिद्धी ,क्रोधि चिडचिडा ,चिल्लाना व
लाते मारना :- यदि बच्चा हठी क्रोधि चिडचिडा ,चिल्लाना व लाते मारना किसी को दूने नही
देना एक क्षण में क्रोधित तो दूसरे ही क्षण में जोर से हॅसने लगना इन लक्षणों पर
सैनिक्युला दबा का प्रयोग करना चाहिये ।
बच्चों
का गोद में धूमने के लिये जिदद करना :-
यदि बच्चा गोद में टंगा रहता हो या गोद में धूमने के लिये जिदद करता हो तो ऐसे
बच्चों को एन्टीमोनियम टार्ट देना चाहिये ।
बच्चों का अनावश्यक जिदद करना :- यदि बच्चा अनावश्यक जिदद करता हो एंव उसे गुस्सा आता हो तथा
चिडचिडाता हो एंव जो भी चीजे दो उसे फेक देता हो तो उसे कैमोमिला दवा देना चाहिये
इससे अनावश्यक जिदद करने एंव चिडचिडाने तथा क्रोधित होने की प्रवृति बदल जाती है
।
बच्चों का रात में रोना दिन में सोना :- यदि बच्चा रात में रोता हो और दिन में
सो जाता हो व शान्त खेलता रहता हो तो ऐसे बच्चों को जेलपा देना चाहिये , लक्षणा
अनुसार कुछ चिकित्सक सोरिनम दबा के पक्षधर है । अत: इन दोनो दवाओं के लक्षणों का
चयन कर दबा का निर्वाचन करना चाहिये ।
बच्चा रात भर रोता है और दिन में ठीक रहता है :- यदि बच्चा रात भर रोता हो एंव दिन में
ठीक रहता हो तो ऐसे बच्चों को रियूम तथा जेलपा जैसी दबाये देना चाहिये । (डॉ सत्यवृत)
बच्चा दिन में रोता है एंव रात्रि में सोता है :- यदि बच्चा दिन में रोता रहता है एंव
रात्रि में सोता रहता हो तो ऐसे बच्चों को लाईकोपोडियम दबा देना चाहिये ।
क्षूठ मूठ के रोने का उपक्रम :- यदि बच्चा
क्षूठ मूठ के रोने का उपक्रम करे परन्तु ऑसू न जाये तो ऐसी स्थितियों में उसे स्टेफिग्रेसिया
30 या 200 शक्ति में देने से उसेकी यह आदत ठीक हो जाती है ।
अनुभव :-
हमारे पडौस में एक महिला रहती थी जो घरों में बर्तन साफ करने का काम करती थी उसकी
दो बच्चीयॉ थी बडी बच्ची जिसकी उम्र लगभग 10 या 12 वर्ष होगी एंव दुसरी बच्ची
जिसकी उम्र मात्र पॉच या छै: वर्ष के आस पास थी । वह मानसिक विकलांग थी मुंह से
बोल नही सकती थी , एंव रात दिन जोर जोर से रोया करती थी । यदि उसकी मॉ उसे कहीं पर
बैठाल देती तो वह खेलने लगती परन्तु रोते रोते खेलती थी , उसके रोने के लक्षण स्पष्ट
नही हो रहे थे जैसा कि ऊपर की दवाओं में दिन में या रात में रोने व सोने के अलग
अलग लक्षण है इस लिये उसे जेलपा-30 रियूम-30 तथा लाईकोपोडियम-30 जैसी दबाये
प्रर्यायक्रम से दी गयी । बच्ची के मुंह से लार टपकने पर उसे मर्कसाल 30 दिया गया
बच्ची के कुछ लक्षण सल्फर से बहुत कुछ मिलते थे इसलिये उसे सल्फर -200 दिया गया
इसके बहुत ही आर्श्चयजनक परिणाम मिले । मुंह से लार बहना बन्द हो गया एंव उसके रोने की प्रवृति
बदल गयी ।
डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल
E Mail- jjsociety1@gmail.com
(बी एच एम एस,एम0डी0)
जन जागरण चैरिटेबल हाँस्पिटल
अध्यक्ष जन जागरण एजुकेशनल एण्ड हेल्थ वेलफेयर
सोसायटी हीरो शो रूम के पास मकरोनिया सागर म0प्र0
खुलने का समय 10.00 से 4.00 बजे तक
M.9300071924
M.9300071924
डॉ0 कृृृष्णभूूषण सिंह चन्देल
एम0डी0
अध्यक्ष - चैरिटेबिल हाँस्पिटल
M -9926436304
पैथालाजी रोग एंव होम्योपैथिक (विकृति विज्ञान)
पैथालाजी
रोग एंव होम्योपैथिक (विकृति विज्ञान)
होम्योपैथिक एक लक्षण विधान चिकित्सा पद्धति है इसमें किसी रोग का उपचार नही किया जाता बल्की लक्षणों को ध्यान में रखकर औषधियों का र्निवाचन किया जाता है । परन्तु कई पैथालाजी परिक्षण उपरान्त जब यह सिद्ध हो जाता है कि रोगी को बीमारी क्या है ऐसी अवस्था में लक्षणों को ध्यान में रख कर औषधियों का निर्वाचन तो किया ही जसतस है परन्तु पैथालाजी के परिणामों को ध्यान में रख निर्धारित औषधियों के प्रयोग से परिणाम भी आशानुरूप प्राप्त होते है ।
रक्त
में पाई जाने वाली कोशिकाओं की बनावट उसकी संख्या में वृद्धि या कमी से विभिन्न
प्रकार के रोग होते है ।
रक्त में तीन प्रकार की कोशिकायें पाई
जाती है
1-इथ्रोसाईट (आर बी
सी )
2-ल्युकोसाईट (डब्लू
बी सी )
3-थम्ब्रोसाईट (प्लेटलेटस
)
1-इथ्रोसाईट (आर बी सी ) लाल रक्त
कणिकायें :-
लाल रक्त कणिकायें या आर बी सी की संख्या के घटने बढने की दो अवस्थायें
निम्नानुसार है ।
(अ) इथ्रोसाईटोसिस
या पोलीसाईथिमिया (बहु लोहित कोशिका रक्तता या लाल रक्त कण का बढना) :-जब रक्त में आर बी सी की संख्या बढ जाती है तो ऐसी स्थिति को
इथ्रोसाईटोसिस (बहु लोहित कोशिका रक्तता या लाल रक्त कण का बढना )या
पॉलीसाईथिमिया कहते है ।
(ब)
इथ्रोसाईटोपैनिया (लोहित कोशिका हास या लाल रक्त कण की कम होना) :- जब रक्त में
लाल रक्त कणों की मात्रा घट जाती है तो ऐसी स्थिति को इथ्रोसाईटोपैनिया (लोहित
कोशिका हास या लाल रक्त कण की कम होना)कहते है । mi
2-ल्युकोसाईट
(डब्लू बी सी )
श्वेत रक्त कोशिकाये या डब्लू बी सी की संख्या के कम या अधिक होने की दो
अवस्थाये निम्नानुसार है ।
(अ) ल्युकोसायटोसिस (श्वेत कोशिका बाहुलता या श्ेवत रक्त
कणों की वृद्धि) :- रक्त में जब श्वेत रक्त कोशिकाओं की मात्रा बढ कर 10000 प्रतिधन मि मी से
ऊपर पहूंच जाती है तो ऐसी स्थिति को श्वेत कोशिका बहुलता कहते है । स्वस्थ्य मनुष्य में इसकी संख्या 5000 से
9000 प्रतिधन मिली होती है परन्तु रोगजनक अवस्थाओं में इसकी संख्या बढ जाती है
। रूधिर कैंसर जिसमें ल्यूकोसाईटस की संख्या बढ जाती है ।
(ब) ल्युकोपेनिया (श्ेवत कोशिका अल्पता या श्ेवत रक्त
कणों का घटना ):- जब श्ेवत रक्त कोशिकाओं की संख्या घट कर 4000 प्रतिघन मी मी रक्त में कम
हो जाती है तो ऐसी स्थिति को श्वेत कोशिका अल्पता या रक्त में श्वेत रक्त
कणों का घटना ल्युकोपेनिया कहलाता है ।
ल्युकोसायटोसिस :- रक्त में जब श्वेत
रक्त कोशिकाओं की मात्रा बढ कर 10000 प्रतिधन मि मी से ऊपर पहूंच जाती है तो ऐसी
स्थिति को श्वेत कोशिका बहुलता कहते है । स्वस्थ्य मनुष्य में इसकी
संख्या 5000 से 9000 प्रतिधन मिली होती है परन्तु रोगजनक अवस्थाओं में इसकी
संख्या बढ जाती है ।
1-रक्त में डब्लू
बी सी की अधिकता ल्यूकोसाईटोसिस :- यदि रक्त में डब्लू बी सी की
अधिकता है तो ऐसी स्थिति में बैराईटा आयोड 30 शक्ती में छै: छै: घन्टे के अन्तराल
से प्रयोग करने से उब्लू बी सी की मात्रा कम होने लगती है (डॉ0घोष)
(अ) लाल रक्त कणिकाओं
का बढना एंव श्वेत रक्त कणिकाओं का घटना :- डॉ0 घोष ने
लिखा है कि बैराईटा म्योरटिका से शरीर की लाल रक्त कणिकाये घट जाती है और श्वेत
कण बढ जाते है ।
(ब) डब्लू बी सी बढने पर :- रक्त में श्वेत
रक्त कण के बढने पर पायरोजिनम दबा का प्रयोग करना चाहिये ।
(स) रक्त में डब्लू बी सी की अधिकता :- यदि रक्त में डब्लू बी सी की अधिकता के साथ ग्रन्थियों में गांठे हो तो
आर्सेनिक एल्ब , आर्सैनिक आयोडेट 3 एक्स में प्रयोग करना चाहिये ,फेरम फॉस एंव
नेट्रम म्यूर ,पिकरिक ऐसिड दबाओं का भी लक्षण अनुसार प्रयोग किया जा सकता है । डॉ0बोरिक ने लिखा है कि डब्लू बी सी की अधिकता
में फेरम फॉस उत्तम दबा है उन्होने कहॉ है कि रक्त कणिका जन्य रोग एंव शिथिल
मॉस पेशीय जन्य रोग आदि में आयरन प्रथम दबा है । लोहे की कमी जनित अवस्थाओं में
आयरन देने अर्थात फेरम फॉस दवा देने से मॉस पेशियॉ सबल एंव रक्त वाहिनीय उपयुक्त
चाप के साथ संकुचित होकर रक्त संचार में सुधार लाती है । यह दबा लाल रक्त कणों
की कमी ,बजन व शक्ति की कमी में अच्छा कार्य करती है । कहने का अर्थ यह है कि रक्त
में आयरन की कमी होने से रक्त सम्बन्धित जो भी व्याधियॉ होती है उसमें फेरम फॉस
अच्छा कार्य करती है लाल रक्त कणों की कमी एंव श्वेत रक्त कणों की वृद्धि में
इस दबा को 6 या 12 एक्स में लम्बे समय तक प्रयोग करना चाहिये ।
2-ल्युकोपेनिया (श्वेत रक्त
कोशिका अल्पता ):- जब श्ेवत रक्त कोशिकाओं
की संख्या घट कर 5000 प्रति धन मी मी रक्त में कम हो जाती है तो ऐसी स्थिति को
ल्युकोपेनिया या श्वेत रक्त कोशिका अल्पता कहते है ।
1-यदि रक्त में श्वेत रक्त
कण घटते हो :- यदि रक्त में डब्लू बी
सी घटता हो तो ऐसी स्थिति में क्लोरमफेनिकाल दबा का प्रयोग किया जा सकता है । यह
दबा प्रारम्भ में 30 या इससे भी कम शक्ति की दबा का प्रयोग नियमित एंव लम्बे समय
तक लेते रहना चाहिये , लाभ होने पर धीरे धीरे उच्च से उच्चतम शक्ति का प्रयोग
किया जा सकता है
हीमोग्लोबीन :- स्वस्थ्य व्यक्ति के शरीर में रक्त के लाल
पदार्थ को हीमोग्लोबीन कहते है हीमोग्लोबिन के प्रतिशत का गिर जाना रक्त अल्पता
का कारण बनता है 100 एम एल में रक्त रंजक की मात्रा लगभग 15 ग्राम पाई जाती है ।
रक्त में हीमोग्लोबीन की कमी
रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी :-यदि
रक्त में हिमोग्लोबिन की कमी है तो फेरम फॉस 3 एक्स या 6 एक्स शक्ति में
प्रयोग करना चाहिये ।
लाल रक्त कणों की
संख्या बढाने हेतु :- रक्त में लाल रक्त कणों की कमी को हिमोग्लोबिन की कमी कहते है । इस अवस्था
में जिंकम मैटालिकम दबा का प्रयोग किया जा सकता है । कुछ चिकित्सक फेरम मेल्ट
एंव फेरम फॉस दबा को लाल रक्त कणों की संख्या बढाने हेतु पर्यायक्रम से प्रयोग
करते है ।
हिमोफिलीयॉ रक्त स्त्रावी
प्रकृति :- हिमोफिलीयॉ में नेट्रम सिलि,फासफोरस दबाओं का प्रयोग किया जा सकता है ।
(अ) रक्त स्त्राव डॉ नैश की इस
करिश्माई दबा को रक्त स्त्राव में प्रयोग किया जाता है रक्त लाल चमकदार होता
है यह शरीर के किसी भी स्वाभाविक अंगों से निकले जैसे नकसीर,उल्टी,लेट्रींग आदि
इसमें मिलीफोलियम क्यू (मदर टिंचर) या 30 देने से लाभ होता है ।
रक्त में टॉक्सीन को दूर करना :- रक्त के टॉक्सीन
को दूर करने के लिये बैनेडियम दवा का प्रयोग करना चाहिये इसके प्रयोग से रक्त के
दूषित पदार्थ नष्ट हो जाते है इस दवा की क्रिया रक्त के दूषित पदार्थो को नष्ट
करना तथा आक्सीजन देना है । इस दबा का प्रयोग निम्न शक्ति में नियमित व लम्बे
समय तक प्रयोग करा चाहिये ।
चर्म रोगों में रक्त
को शुद्ध करने हेतु :- चर्म रोग की दशा में रक्त को
शुद्ध करने के लिये सार्सापैरिला दबा का प्रयोग किया जा सकता है ।
बार बार फूंसियॉ रक्त
शोधक :- यदि बार बार फुंसियॉ हो तो गन पाऊडर का प्रयोग करना
चाहिये इस दबा के प्रयोग से रक्त शुद्ध होता है यह रक्त को शक्ति देती है ।
गनोरिया :- डॉ0 सत्यवृत जी ने लिखा है कि गनोरिया में कैनाबिस सिटावम सी एम शक्ति में
प्रयोग करना चाहिये । इस दबा का असर चार पॉच दिन बाद होता है उन्होने लिखा है कि
यदि इससे भी परिणाम न मिले तो मदर टिन्चर में दबा देना चाहिये ।
प्रोस्टेट ग्लैन्डस
:- डॉ0 कैन्ट कहते है कि प्रोस्टटे ग्लैड की
डिजिटेलिस प्रमुख दबा है
त्चचा में कही भी
तन्तुओं की असीम वृद्धि :- त्वचा में कही भी तन्तुओं की असीम वृद्धि होने पर हाईड्रोकोटाईल 6 या 30
में देना चाहिये ।
नॉखून बाल व हडिडयों
के क्षय में :- नॉखून , बाल व हडिडयों के क्षय में फोलोरिक ऐसिड दवा का प्रयोग करना चाहिये
।
गुर्दा रोग
(नेफराईटिस) गुर्दा रोग:- जिसमें किडनी के नेफरान याने छन्ने में सूजन आ जाती है जिसके कारण रक्त
छनता नही है एंव पेशाब की निकासी का कार्य उचित ढंग से नही होता ,इससे रक्त में
यूरिया की मात्रा बढ जाती है । इसे गुर्दे की बीमारी में शरीर में सूजन आ जाती है
। गुर्दे की इस बीमारीयों में निम्नानुसार दवाओं का चयन किया जा सकता है ।
(अ) पेशाब में एल्बुमिन का आना :- पेशाब में एल्बुमिन आने पर हैलिबोरस दबा का प्रयोग किया जा सकता है इस
अवस्था मे सार्सापेरिला दबा भी उपयोगी है ।
(ब) पेशाब में यूरिक
ऐसिड का बढना :- पेशाब की परिक्षा में क्लोराईड अंश घटता और यूरिक ऐसिड परिणाम में बहुत बढ
जाये तो बैराईटा म्यूर का प्रयोग किया जाना चाहिये ।
(स) पेशाब में
यूरिया अधिक बनने पर :- यदि पेशाब में यूरिया अधिक आने लगे तो कास्टिकम दबा का प्रयोग करना चाहिये
(डॉ0 आर हूजेस) ।
रक्त का एक स्थान में संचय होना
(हाईपेरीमिया) :- रक्त के एक ही स्थान पर संचय होने को हाइपेरीमिया कहते है रक्त हीनता में
कैल्केरिया फॉस के बाद फेरम फॉस दवा अच्छा कार्य करती है ऐसी स्थिति में फेरम
फॉस तथा कैल्केरिया सल्फ का प्रयोग प्रयार्यक्रम से करना चाहिये ।
ऐपेण्डिक्स
एपेण्डिक्स पेट में दाहिनी तरफ एक नली होती है
जो बडी ऑत से अन्तिम छोर से जुडी होती है इसका प्रयोग मानव शरीर में प्राय: नही
होता ,इसका उपयोग ऐसे जानवरों में होता है जो भोजन आदि को स्टॉक कर लेते है एंव जुगाली
करते हे । इस नलीका में प्रेशर या नलिका कमजोर होने की स्थिति में अधिक दबाओं आदि
के कारण भोजन आदि इसमें फॅस कर सडने लगता हो या फिर अधिक दवाब के कारण इसके फटने
का डर बना रहता है । यह हमारे शरीर का बेकार अंग है जिसका उपयोग नही है इसके कमजोर
होने या भोज्य पदार्थो के फॅस जाने से इसमें कई प्रकार के उदभेद उत्पन्न हो
जाते है । इससे पेट में दर्द होता है , यदि नलिका कमजोर हुई तो इसके फॅट जाने का
खतरा बढ जाता है यह स्थिति अत्याधिक खतरनाक होती है । ऐपिन्डस के र्ददों व रोग
स्थिति में निम्न दबाओं का प्रयोग किया जा सकता है ।
1- एपेण्डिक्स में आईरिस टक्ट 3 दवा को इस रोग की सर्वोत्कष्ट दबा है ।
2- एपेण्डिक्स की अवस्था में ब्राईयोनिया 200 एंव नेट्रम सल्फ 30 की दवा
का प्रयोग करने पर अच्छे परिणा मिलते है । इससे र्दद भी दूर हो जाता है एंव रोग
ठीक होने लगता है ब्रायोनिया 200 की दबा की एक खुराक प्रथम सप्ताह एं अगले सप्ताह
एक खुराक 1 एम की देना चाहिये नेट्रम सल्फ 30 दबा का प्रयोग दिन में तीन बार लम्बे
समय तक करना चाहिये । उपरोक्त ब्रायोनियॉ की दो मात्राये देने के बाद जब तक अगली
दबा का प्रयोग न करे ऐसा करने पर यह देखे कि कब तक र्दद या रोग का आक्रमण दुबारा
नही होता यदि सप्ताह में हो तो दूसरी मात्रा 1 एम में देना चाहिये ।
डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल
(बी एच एम एस,एम0डी0)
जन जागरण चैरिटेबल हाँस्पिटल
अध्यक्ष जन जागरण एजुकेशनल एण्ड हेल्थ वेलफेयर
सोसायटी हीरो शो रूम के पास मकरोनिया सागर म0प्र0
खुलने का समय 10.00 से 4.00 बजे तक
M.9300071924
M.9300071924
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)


















