अपामार्ग एचिरैन्थस ऐस्पेरा
विभिन्न भाषाओं में नाम संस्कृत किणिही,
मयूरक, खरमंजरी, अध:शल्य, मर्कटी, दुर्ग्रहा, शिखरी, अपामार्ग।
हिंदी चिरचिटा, चिचड़ा, ओंगा चिचरी, लटजीरा।
मराठी अघाड़ा, अघेड़ा।
गुजराती अघेड़ों।
हिंदी चिरचिटा, चिचड़ा, ओंगा चिचरी, लटजीरा।
मराठी अघाड़ा, अघेड़ा।
गुजराती अघेड़ों।
अरबी चिचिरा
अल्कुम। तैलगु दुच्चीणिके। फारसी खारेवाजगून बंगाली . अपांग। अंग्रेजी प्रिकली चाफ
फ्लावर।
लैटिन एचिरैन्थस ऐस्पेरा।
गुण :
लैटिन एचिरैन्थस ऐस्पेरा।
गुण :
आयुर्वेदिक
मतानुसार अपामार्ग तीखा, कडुवा तथा प्रकृति में गर्म होता है। यह
पाचनशक्तिवर्द्धक, दस्तावर (दस्त लाने वाला),
रुचिकारक, दर्द-निवारक, विष, कृमि व पथरी नाशक, रक्तशोधक (खून को साफ करने वाला),
बुखारनाशक, श्वास रोग नाशक, भूख को नियंत्रित करने वाला होता है तथा सुखपूर्वक
प्रसव हेतु एवं गर्भधारण में उपयोगी है।
रासायनिक
संगठन :
अपामार्ग
में 30 प्रतिशत
पोटाश, 13 प्रतिशत
चूना, 7 प्रतिशत
सोरा, 4 प्रतिशत लौह
तत्व, दो प्रतिशत
नमक एवं दो प्रतिशत गंधक पाया गया है। इसके पत्तों की अपेक्षा जड़ की राख में ये
तत्त्व अधिकता से मिलते हैं।
मात्रा
:
अपामार्ग
के पत्ते, जड़ व बीज
का चूर्ण 3 से 5
ग्राम। पत्तों का रस 10
से 20 मिलीलीटर। भस्म आधे से एक ग्राम
विभिन्न
रोगों में सहायक :
1. विष पर :
जानवरों के काटने व
सांप, बिच्छू,
जहरीले कीड़ों के काटे स्थान पर अपामार्ग
के पत्तों का ताजा रस लगाने और पत्तों का रस 2 चम्मच की मात्रा में 2
बार पिलाने से विष का असर तुरंत घट जाता
है और जलन तथा दर्द में आराम मिलता है। इसके पत्तों की पिसी हुई लुगदी को दंश के
स्थान पर पट्टी से बांध देने से सूजन नहीं आती और दर्द दूर हो जाता है। सूजन चढ़
चुकी हो तो शीघ्र ही उतर जाती है
ततैया, बिच्छू तथा अन्य जहरीले कीड़ों के दंश पर इसके पत्ते का रस लगा देने से जहर उतर जाता है। काटे स्थान पर बाद में 8-10 पत्तों को पीसकर लुगदी बांध देते हैं। इससे व्रण (घाव) नहीं होता है।
2. दांतों का दर्द :
ततैया, बिच्छू तथा अन्य जहरीले कीड़ों के दंश पर इसके पत्ते का रस लगा देने से जहर उतर जाता है। काटे स्थान पर बाद में 8-10 पत्तों को पीसकर लुगदी बांध देते हैं। इससे व्रण (घाव) नहीं होता है।
2. दांतों का दर्द :
अपामार्ग की शाखा
(डाली) से दातुन करने पर कभी-कभी होने वाले तेज दर्द खत्म हो जाते हैं तथा मसूढ़ों
से खून का आना बंद हो जाता है।
अपामार्ग के फूलों की मंजरी को पीसकर नियमित रूप से दांतों पर मलकर मंजन करने से दांत मजबूत हो जाते हैं। पत्तों के रस को दांतों के दर्द वाले स्थान पर लगाने से दर्द में राहत मिलती है। तने या जड़ की दातुन करने से भी दांत मजबूत होते हैं एवं मुंह की दुर्गन्ध नष्ट होती है।
इसके 2-3 पत्तों के रस में रूई का फोया बनाकर दांतों में लगाने से दांतों के दर्द में लाभ पहुंचता है तथा पुरानी से पुरानी गुहा को भरने में मदद करता है।
अपामार्ग की ताजी जड़ से प्रतिदिन दातून करने से दांत मोती की तरह चमकने लगते हैं। इससे दांतों का दर्द, दांतों का हिलना, मसूढ़ों की कमजोरी तथा मुंह की दुर्गन्ध दूर हो जाती है।
3. प्रसव सुगमता से होना :
अपामार्ग के फूलों की मंजरी को पीसकर नियमित रूप से दांतों पर मलकर मंजन करने से दांत मजबूत हो जाते हैं। पत्तों के रस को दांतों के दर्द वाले स्थान पर लगाने से दर्द में राहत मिलती है। तने या जड़ की दातुन करने से भी दांत मजबूत होते हैं एवं मुंह की दुर्गन्ध नष्ट होती है।
इसके 2-3 पत्तों के रस में रूई का फोया बनाकर दांतों में लगाने से दांतों के दर्द में लाभ पहुंचता है तथा पुरानी से पुरानी गुहा को भरने में मदद करता है।
अपामार्ग की ताजी जड़ से प्रतिदिन दातून करने से दांत मोती की तरह चमकने लगते हैं। इससे दांतों का दर्द, दांतों का हिलना, मसूढ़ों की कमजोरी तथा मुंह की दुर्गन्ध दूर हो जाती है।
3. प्रसव सुगमता से होना :
प्रसव में ज्यादा
विलम्ब हो रहा हो और असहनीय पीड़ा महसूस हो रही हो, तो रविवार या पुष्य नक्षत्र वाले दिन जड़ सहित
उखाड़ी सफेद अपामार्ग की जड़ काले कपड़े में बांधकर प्रसूता के गले में बांधने या कमर
में बांधने से शीघ्र प्रसव हो जाता है। प्रसव के तुरंत बाद जड़ शरीर से अलग कर देनी
चाहिए, अन्यथा
गर्भाशय भी बाहर निकल सकता है। जड़ को पीसकर पेड़ू पर लेप लगाने से भी यही लाभ मिलता
है। लाभ होने के बाद लेप पानी से साफ कर दें।
चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ को स्त्री की योनि में रखने से बच्चा आसानी से पैदा होता है।
पाठा, कलिहारी, अडूसा, अपामार्ग इनमें से किसी एक औषधि की जड़ के तैयार लेप को नाभि, नाभि के नीचे के हिस्से पर लेप करने से प्रसव सुखपूर्वक होता है। प्रसव पीड़ा प्रारम्भ होने से पहले अपामार्ग के जड़ को एक धागे में बांधकर कमर में बांधने से प्रसव सुखपूर्वक होता है, परंतु प्रसव होते ही उसे तुरंत हटा लेना चाहिए।
अपामार्ग की जड़ तथा कलिहारी की जड़ को लेकर एक पोटली मे रखें। फिर स्त्री की कमर से पोटली को बांध दें। प्रसव आसानी से हो जाता है।
4. स्वप्नदोष : अपामार्ग की जड़ का चूर्ण और मिश्री बराबर की मात्रा में पीसकर रख लें। 1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार 1-2 हफ्ते तक सेवन करें।
चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ को स्त्री की योनि में रखने से बच्चा आसानी से पैदा होता है।
पाठा, कलिहारी, अडूसा, अपामार्ग इनमें से किसी एक औषधि की जड़ के तैयार लेप को नाभि, नाभि के नीचे के हिस्से पर लेप करने से प्रसव सुखपूर्वक होता है। प्रसव पीड़ा प्रारम्भ होने से पहले अपामार्ग के जड़ को एक धागे में बांधकर कमर में बांधने से प्रसव सुखपूर्वक होता है, परंतु प्रसव होते ही उसे तुरंत हटा लेना चाहिए।
अपामार्ग की जड़ तथा कलिहारी की जड़ को लेकर एक पोटली मे रखें। फिर स्त्री की कमर से पोटली को बांध दें। प्रसव आसानी से हो जाता है।
4. स्वप्नदोष : अपामार्ग की जड़ का चूर्ण और मिश्री बराबर की मात्रा में पीसकर रख लें। 1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार 1-2 हफ्ते तक सेवन करें।
5. मुंह के छाले : अपामार्ग के पत्तों का रस छालों पर लगाएं।
6. शीघ्रपतन : अपामार्ग की जड़ को अच्छी तरह धोकर सुखा लें। इसका
चूर्ण बनाकर 2 चम्मच की मात्रा में लेकर 1
चम्मच शहद मिला लें। इसे 1
कप ठंडे दूध के साथ नियमित रूप से कुछ
हफ्तों तक सेवन करने से वीर्य बढ़ता है।
7. संतान प्राप्ति के लिए : अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को एक चम्मच की मात्रा
में दूध के साथ मासिक-स्राव के बाद नियमित रूप से 21 दिन तक सेवन करने से गर्मधारण होता है। दूसरे
प्रयोग के रूप में ताजे पत्तों के 2 चम्मच रस को 1 कप दूध के साथ मासिक-स्राव के बाद नियमित सेवन से
भी गर्भ स्थिति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
8. मोटापा : अधिक भोजन करने के कारण जिनका वजन बढ़ रहा हो,
उन्हें भूख कम करने के लिए अपामार्ग के बीजों
को चावलों के समान भात या खीर बनाकर नियमित सेवन करना चाहिए। इसके प्रयोग से शरीर
की चर्बी धीरे-धीरे घटने भी लगेगी।
9. कमजोरी : अपामार्ग के बीजों को भूनकर इसमें बराबर की
मात्रा में मिश्री मिलाकर पीस लें। 1 कप दूध के साथ 2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम नियमित सेवन करने से
शरीर में पुष्टता आती है।
10. सिर में दर्द : अपामार्ग की जड़ को पानी में घिसकर बनाए लेप को
मस्तक पर लगाने से सिर दर्द दूर होता है।
11. मलेरिया से बचाव : अपामार्ग के पत्ते और कालीमिर्च बराबर की मात्रा
में लेकर पीस लें, फिर इसमें थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर मटर के दानों के
बराबर की गोलियां तैयार कर लें। जब मलेरिया फैल रहा हो,
उन दिनों एक-एक गोली सुबह-शाम भोजन के बाद
नियमित रूप से सेवन करने से इस ज्वर का शरीर पर आक्रमण नहीं होगा। इन गोलियों का
दो-चार दिन सेवन पर्याप्त होता है।
12. गंजापन : सरसों के तेल में अपामार्ग के पत्तों को जलाकर
मसल लें और मलहम बना लें। इसे गंजे स्थानों पर नियमित रूप से लेप करते रहने से
पुन: बाल उगने की संभावना होगी।
13. खुजली :अपामार्ग के पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फूल और फल) को पानी में उबालकर काढ़ा तैयार करें और
इससे स्नान करें। नियमित रूप से स्नान करते रहने से कुछ ही दिनों में खुजली दूर
जाएगी।
14. आधाशीशी (आधे सिर में दर्द) : इसके बीजों के चूर्ण को सूंघने मात्र से ही
आधाशीशी, मस्तक की
जड़ता में आराम मिलता है। इस चूर्ण को सुंघाने से मस्तक के अंदर जमा हुआ कफ पतला
होकर नाक के द्वारा निकल जाता है और वहां पर पैदा हुए कीड़े भी झड़ जाते हैं।
15. बहरापन : अपामार्ग की साफ धोई हुई जड़ का रस निकालकर उसमें
बराबर मात्रा में तिल को मिलाकर आग में पकायें। जब तेल मात्र शेष रह जाये तब छानकर
शीशी में रख लें। इस तेल की 2-3 बूंद गर्म करके हर रोज कान में डालने से कान का
बहरापन दूर होता है।
16. आंखों के रोग : आंख की फूली में अपामार्ग की जड़ के 2
ग्राम चूर्ण को 2
चम्मच शहद के साथ मिलाकर दो-दो बूंद आंख
में डालने से लाभ होता है।
धुंधला दिखाई देना, आंखों का दर्द, आंखों से पानी बहना, आंखों की लालिमा, फूली, रतौंधी आदि विकारों में इसकी स्वच्छ जड़ को साफ तांबे के बरतन में, थोड़ा-सा सेंधानमक मिले हुए दही के पानी के साथ घिसकर अंजन रूप में लगाने से लाभ होता है।
17. खांसी : अपामार्ग की जड़ में बलगमी खांसी और दमे को नाश करने का चामत्कारिक गुण हैं। इसके 8-10 सूखे पत्तों को बीड़ी या हुक्के में रखकर पीने से खांसी में लाभ होता है।
अपामार्ग के चूर्ण में शहद मिलाकर सुबह-शाम चटाने से बच्चों की श्वासनली तथा छाती में जमा हुआ कफ दूर होकर बच्चों की खांसी दूर होती है।
खांसी बार-बार परेशान करती हो, कफ निकलने में कष्ट हो, कफ गाढ़ा व लेसदार हो गया हो, इस अवस्था में या न्यूमोनिया की अवस्था में आधा ग्राम अपामार्ग क्षार व आधा ग्राम शर्करा दोनों को 30 मिलीलीटर गर्म पानी में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से 7 दिन में बहुत ही लाभ होता है।
श्वास रोग की तीव्रता में अपामार्ग की जड़ का चूर्ण 6 ग्राम व 7 कालीमिर्च का चूर्ण, दोनों को सुबह-शाम ताजे पानी के साथ लेने से बहुत लाभ होता है।
18. विसूचिका (हैजा) : अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को 2 से 3 ग्राम तक दिन में 2-3 बार शीतल पानी के साथ सेवन करने से तुरंत ही विसूचिका नष्ट होती है। अपामार्ग के 4-5 पत्तों का रस निकालकर थोड़ा जल व मिश्री मिलाकर देने से विसूचिका में अच्छा लाभ मिलता है।
अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़, 4 कालीमिर्च, 4 तुलसी के पत्तें। इन सबको पीसकर तथा पानी में घोलकर इतनी ही मात्रा में बार-बार पिलाएं।
कंजा की जड़, अपामार्ग की जड़, नीम की अंतरछाल, गिलोय, कुड़ा की छाल-इन सबको समान मात्रा में लेकर काढ़ा बनायें। शीतल होने पर 10-10 ग्राम की मात्रा में 3 दिन सेवन कराने से हैजा का प्रभाव शांत हो जाता है।
19. बवासीर : अपामार्ग के बीजों को पीसकर उनका चूर्ण 3 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम चावलों के धोवन के साथ देने से खूनी बवासीर में खून का आना बंद हो जाता है।
अपामार्ग की 6 पत्तियां, कालीमिर्च 5 पीस को जल के साथ पीस छानकर सुबह-शाम सेवन करने से बवासीर में लाभ हो जाता है और उसमें बहने वाला रक्त रुक जाता है।
पित्तज या कफ युक्त खूनी बवासीर पर अपामार्ग की 10 से 20 ग्राम जड़ को चावल के धोवन के साथ पीस-छानकर 2 चम्मच शहद मिलाकर पिलाना गुणकारी हैं।
अपामार्ग की जड़, तना, पत्ता, फल और फूल को मिलाकर काढ़ा बनायें और चावल के धोवन अथवा दूध के साथ पीयें। इससे खूनी बवासीर में खून का गिरना बंद हो जाता है।
अपामार्ग का रस निकालकर या इसके 3 ग्राम बीज का चूर्ण बनाकर चावल के धोवन (पानी) के साथ पीने से बवासीर में खून का निकलना बंद हो जाता है।
20. उदर विकार (पेट के रोग) : अपामार्ग पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ती) को 20 ग्राम लेकर 400 मिलीलीटर पानी में पकायें, जब चौथाई शेष रह जाए तब उसमें लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग नौसादर चूर्ण तथा एक ग्राम कालीमिर्च चूर्ण मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करने से पेट का दर्द दूर हो जाता है।
पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ती) का काढ़ा 50-60 मिलीलीटर भोजन के पूर्व सेवन से पाचन रस में वृद्धि होकर दर्द कम होता है। भोजन के दो से तीन घंटे पश्चात पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ती) का गर्म-गर्म 50-60 मिलीलीटर काढ़ा पीने से अम्लता कम होती है तथा श्लेष्मा का शमन होता है। यकृत पर अच्छा प्रभाव होकर पित्तस्राव उचित मात्रा में होता है, जिस कारण पित्त की पथरी तथा बवासीर में लाभ होता है।
21. भस्मक रोग (भूख का बहुत ज्यादा लगना) : भस्मक रोग जिसमें बहुत भूख लगती है और खाया हुआ अन्न भस्म हो जाता है परंतु शरीर कमजोर ही बना रहता है, उसमें अपामार्ग के बीजों का चूर्ण 3 ग्राम दिन में 2 बार लगभग एक सप्ताह तक सेवन करें। इससे निश्चित रूप से भस्मक रोग मिट जाता है।
अपामार्ग के 5-10 ग्राम बीजों को पीसकर खीर बनाकर खिलाने से भस्मक रोग मिट जाता है। यह प्रयोग अधिक से अधिक 3 बार करने से रोग ठीक होता है। इसके 5-10 ग्राम बीजों को खाने से अधिक भूख लगना बंद हो जाती है।
अपामार्ग के बीजों को कूट छानकर, महीन चूर्ण करें तथा बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर, तीन-छ: ग्राम तक सुबह-शाम पानी के साथ प्रयोग करें। इससे भी भस्मक रोग ठीक हो जाता है।
22. वृक्कशूल (गुर्दे का दर्द) : अपामार्ग (चिरचिटा) की 5-10 ग्राम ताजी जड़ को पानी में घोलकर पिलाने से बड़ा लाभ होता है। यह औषधि मूत्राशय की पथरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है। गुर्दे के दर्द के लिए यह प्रधान औषधि है।
धुंधला दिखाई देना, आंखों का दर्द, आंखों से पानी बहना, आंखों की लालिमा, फूली, रतौंधी आदि विकारों में इसकी स्वच्छ जड़ को साफ तांबे के बरतन में, थोड़ा-सा सेंधानमक मिले हुए दही के पानी के साथ घिसकर अंजन रूप में लगाने से लाभ होता है।
17. खांसी : अपामार्ग की जड़ में बलगमी खांसी और दमे को नाश करने का चामत्कारिक गुण हैं। इसके 8-10 सूखे पत्तों को बीड़ी या हुक्के में रखकर पीने से खांसी में लाभ होता है।
अपामार्ग के चूर्ण में शहद मिलाकर सुबह-शाम चटाने से बच्चों की श्वासनली तथा छाती में जमा हुआ कफ दूर होकर बच्चों की खांसी दूर होती है।
खांसी बार-बार परेशान करती हो, कफ निकलने में कष्ट हो, कफ गाढ़ा व लेसदार हो गया हो, इस अवस्था में या न्यूमोनिया की अवस्था में आधा ग्राम अपामार्ग क्षार व आधा ग्राम शर्करा दोनों को 30 मिलीलीटर गर्म पानी में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से 7 दिन में बहुत ही लाभ होता है।
श्वास रोग की तीव्रता में अपामार्ग की जड़ का चूर्ण 6 ग्राम व 7 कालीमिर्च का चूर्ण, दोनों को सुबह-शाम ताजे पानी के साथ लेने से बहुत लाभ होता है।
18. विसूचिका (हैजा) : अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को 2 से 3 ग्राम तक दिन में 2-3 बार शीतल पानी के साथ सेवन करने से तुरंत ही विसूचिका नष्ट होती है। अपामार्ग के 4-5 पत्तों का रस निकालकर थोड़ा जल व मिश्री मिलाकर देने से विसूचिका में अच्छा लाभ मिलता है।
अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़, 4 कालीमिर्च, 4 तुलसी के पत्तें। इन सबको पीसकर तथा पानी में घोलकर इतनी ही मात्रा में बार-बार पिलाएं।
कंजा की जड़, अपामार्ग की जड़, नीम की अंतरछाल, गिलोय, कुड़ा की छाल-इन सबको समान मात्रा में लेकर काढ़ा बनायें। शीतल होने पर 10-10 ग्राम की मात्रा में 3 दिन सेवन कराने से हैजा का प्रभाव शांत हो जाता है।
19. बवासीर : अपामार्ग के बीजों को पीसकर उनका चूर्ण 3 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम चावलों के धोवन के साथ देने से खूनी बवासीर में खून का आना बंद हो जाता है।
अपामार्ग की 6 पत्तियां, कालीमिर्च 5 पीस को जल के साथ पीस छानकर सुबह-शाम सेवन करने से बवासीर में लाभ हो जाता है और उसमें बहने वाला रक्त रुक जाता है।
पित्तज या कफ युक्त खूनी बवासीर पर अपामार्ग की 10 से 20 ग्राम जड़ को चावल के धोवन के साथ पीस-छानकर 2 चम्मच शहद मिलाकर पिलाना गुणकारी हैं।
अपामार्ग की जड़, तना, पत्ता, फल और फूल को मिलाकर काढ़ा बनायें और चावल के धोवन अथवा दूध के साथ पीयें। इससे खूनी बवासीर में खून का गिरना बंद हो जाता है।
अपामार्ग का रस निकालकर या इसके 3 ग्राम बीज का चूर्ण बनाकर चावल के धोवन (पानी) के साथ पीने से बवासीर में खून का निकलना बंद हो जाता है।
20. उदर विकार (पेट के रोग) : अपामार्ग पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ती) को 20 ग्राम लेकर 400 मिलीलीटर पानी में पकायें, जब चौथाई शेष रह जाए तब उसमें लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग नौसादर चूर्ण तथा एक ग्राम कालीमिर्च चूर्ण मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करने से पेट का दर्द दूर हो जाता है।
पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ती) का काढ़ा 50-60 मिलीलीटर भोजन के पूर्व सेवन से पाचन रस में वृद्धि होकर दर्द कम होता है। भोजन के दो से तीन घंटे पश्चात पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ती) का गर्म-गर्म 50-60 मिलीलीटर काढ़ा पीने से अम्लता कम होती है तथा श्लेष्मा का शमन होता है। यकृत पर अच्छा प्रभाव होकर पित्तस्राव उचित मात्रा में होता है, जिस कारण पित्त की पथरी तथा बवासीर में लाभ होता है।
21. भस्मक रोग (भूख का बहुत ज्यादा लगना) : भस्मक रोग जिसमें बहुत भूख लगती है और खाया हुआ अन्न भस्म हो जाता है परंतु शरीर कमजोर ही बना रहता है, उसमें अपामार्ग के बीजों का चूर्ण 3 ग्राम दिन में 2 बार लगभग एक सप्ताह तक सेवन करें। इससे निश्चित रूप से भस्मक रोग मिट जाता है।
अपामार्ग के 5-10 ग्राम बीजों को पीसकर खीर बनाकर खिलाने से भस्मक रोग मिट जाता है। यह प्रयोग अधिक से अधिक 3 बार करने से रोग ठीक होता है। इसके 5-10 ग्राम बीजों को खाने से अधिक भूख लगना बंद हो जाती है।
अपामार्ग के बीजों को कूट छानकर, महीन चूर्ण करें तथा बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर, तीन-छ: ग्राम तक सुबह-शाम पानी के साथ प्रयोग करें। इससे भी भस्मक रोग ठीक हो जाता है।
22. वृक्कशूल (गुर्दे का दर्द) : अपामार्ग (चिरचिटा) की 5-10 ग्राम ताजी जड़ को पानी में घोलकर पिलाने से बड़ा लाभ होता है। यह औषधि मूत्राशय की पथरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है। गुर्दे के दर्द के लिए यह प्रधान औषधि है।
23. योनि में दर्द होने पर : अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को पीसकर रस निकालकर
रूई को भिगोकर योनि में रखने से योनिशूल और मासिक धर्म की रुकावट मिटती है।
24. गर्भधारण करने के लिए : अनियमित मासिक धर्म या अधिक रक्तस्राव होने के
कारण से जो स्त्रियां गर्भधारण नहीं कर पाती हैं, उन्हें ऋतुस्नान (मासिक-स्राव) के दिन से उत्तम
भूमि में उत्पन्न अपामार्ग के 10 ग्राम पत्ते, या इसकी 10 ग्राम जड़ को गाय के 125
मिलीलीटर दूध के साथ पीस-छानकर 4
दिन तक सुबह,
दोपहर और शाम को पिलाने से स्त्री
गर्भधारण कर ल। यह प्रयोग यदि एक बार में सफल न हो तो अधिक से अधिक तीन बार करें।
अपामार्ग की जड़ और लक्ष्मण बूटी 40 ग्राम की मात्रा में बारीक पीस-छानकर रख लेते हैं। इसे गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध के साथ सुबह के समय मासिक-धर्म समाप्त होने के बाद से लगभग एक सप्ताह तक सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से स्त्री गर्भधारण के योग्य हो जाती है।
25. रक्तप्रदर : अपामार्ग के ताजे पत्ते लगभग 10 ग्राम, हरी दूब पांच ग्राम, दोनों को पीसकर, 60 मिलीलीटर पानी में मिलाकर छान लें, तथा गाय के दूध में इच्छानुसार मिश्री मिलाकर सुबह-सुबह 7 दिन तक पिलाने से अत्यंत लाभ होता है। यह प्रयोग रोग ठीक होने तक नियमित करें, इससे निश्चित रूप से रक्तप्रदर ठीक हो जाता है। यदि गर्भाशय में गांठ की वजह से खून का बहना होता हो तो भी गांठ भी इससे घुल जाता है।
10 ग्राम अपामार्ग के पत्ते, 5 दाने कालीमिर्च, 3 ग्राम गूलर के पत्ते को पीसकर चावलों के धोवन के पानी के साथ सेवन करने से रक्त प्रदर में लाभ होता है।
26. व्रण (घावों) पर : घावों विशेषकर दूषित घावों में अपामार्ग का रस मलहम के रूप में लगाने से घाव भरने लगता है तथा घाव पकने का भय नहीं रहता है।
अपामार्ग की जड़ और लक्ष्मण बूटी 40 ग्राम की मात्रा में बारीक पीस-छानकर रख लेते हैं। इसे गाय के 250 मिलीलीटर कच्चे दूध के साथ सुबह के समय मासिक-धर्म समाप्त होने के बाद से लगभग एक सप्ताह तक सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से स्त्री गर्भधारण के योग्य हो जाती है।
25. रक्तप्रदर : अपामार्ग के ताजे पत्ते लगभग 10 ग्राम, हरी दूब पांच ग्राम, दोनों को पीसकर, 60 मिलीलीटर पानी में मिलाकर छान लें, तथा गाय के दूध में इच्छानुसार मिश्री मिलाकर सुबह-सुबह 7 दिन तक पिलाने से अत्यंत लाभ होता है। यह प्रयोग रोग ठीक होने तक नियमित करें, इससे निश्चित रूप से रक्तप्रदर ठीक हो जाता है। यदि गर्भाशय में गांठ की वजह से खून का बहना होता हो तो भी गांठ भी इससे घुल जाता है।
10 ग्राम अपामार्ग के पत्ते, 5 दाने कालीमिर्च, 3 ग्राम गूलर के पत्ते को पीसकर चावलों के धोवन के पानी के साथ सेवन करने से रक्त प्रदर में लाभ होता है।
26. व्रण (घावों) पर : घावों विशेषकर दूषित घावों में अपामार्ग का रस मलहम के रूप में लगाने से घाव भरने लगता है तथा घाव पकने का भय नहीं रहता है।
27. संधिशोथ (जोड़ों की सूजन) : जोड़ों की सूजन एवं दर्द में अपामार्ग के 10-12
पत्तों को पीसकर गर्म करके बांधने से लाभ
होता है। संधिशोथ व दूषित फोड़े फुन्सी या गांठ वाली जगह पर पत्ते पीसकर लेप लगाने
से गांठ धीरे-धीरे छूट जाती है।
28. बुखार : अपामार्ग (चिरचिटा) के 10-20
पत्तों को 5-10 कालीमिर्च और 5-10 ग्राम लहसुन के साथ पीसकर 5
गोली बनाकर 1-1
गोली बुखार आने से 2
घंटे पहले देने से सर्दी से आने वाला
बुखार छूटता है।
30. श्वासनली में सूजन (ब्रोंकाइटिस) : जीर्ण कफ विकारों और वायु प्रणाली दोषों में
अपामार्ग (चिरचिटा) की क्षार, पिप्पली, अतीस, कुपील, घी और शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से वायु
प्रणाली शोथ (ब्रोंकाइटिस) में पूर्ण लाभ मिलता है।
31. दमा या श्वास रोग : अपामार्ग
के बीजों को चिलम में भरकर इसका धुंआ पीते हैं। इससे श्वास रोग में लाभ मिलता है। अपामार्ग का चूर्ण लगभग आधा ग्राम को शहद के
साथ भोजन के बाद दोनों समय देने से गले व फेफड़ों में जमा,
रुका हुआ कफ निकल जाता है।
अपामार्ग (चिरचिटा) का क्षार 0.24 ग्राम की मात्रा में पान में रखकर खाने अथवा 1 ग्राम शहद में मिलाकर चाटने से छाती पर जमा कफ छूटकर श्वास रोग नष्ट हो जाता है।
चिरचिटा की जड़ को किसी लकड़ी की सहायता से खोद लेना चाहिए। ध्यान रहे कि जड़ में लोहा नहीं छूना चाहिए। इसे सुखाकर पीस लेते हैं। यह चूर्ण लगभग एक ग्राम की मात्रा में लेकर शहद के साथ खाएं इससे श्वास रोग दूर हो जाता है।
अपामार्ग (चिरचिटा) 1 किलो, बेरी की छाल 1 किलो, अरूस के पत्ते 1 किलो, गुड़ दो किलो, जवाखार 50 ग्राम सज्जीखार लगभग 50 ग्राम, नौसादर लगभग 125 ग्राम सभी को पीसकर एक लीटर पानी में भरकर पकाते हैं। पांच किलो के लगभग रह जाने पर इसे उतार लेते हैं। डिब्बे में भरकर मुंह बंद करके इसे 15 दिनों के लिए रख देते हैं फिर इसे छानकर सेवन करें। इसे 7 से 10 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सेवन करें। इससे श्वास, दमा रोग नष्ट हो जाता है।
32. दांतों में कीड़े लगना : चिरमिटी की जड़ को कान पर बांधने से दांतों में लगे कीड़े नष्ट हो जाते हैं।
अपामार्ग (चिरचिटा) का क्षार 0.24 ग्राम की मात्रा में पान में रखकर खाने अथवा 1 ग्राम शहद में मिलाकर चाटने से छाती पर जमा कफ छूटकर श्वास रोग नष्ट हो जाता है।
चिरचिटा की जड़ को किसी लकड़ी की सहायता से खोद लेना चाहिए। ध्यान रहे कि जड़ में लोहा नहीं छूना चाहिए। इसे सुखाकर पीस लेते हैं। यह चूर्ण लगभग एक ग्राम की मात्रा में लेकर शहद के साथ खाएं इससे श्वास रोग दूर हो जाता है।
अपामार्ग (चिरचिटा) 1 किलो, बेरी की छाल 1 किलो, अरूस के पत्ते 1 किलो, गुड़ दो किलो, जवाखार 50 ग्राम सज्जीखार लगभग 50 ग्राम, नौसादर लगभग 125 ग्राम सभी को पीसकर एक लीटर पानी में भरकर पकाते हैं। पांच किलो के लगभग रह जाने पर इसे उतार लेते हैं। डिब्बे में भरकर मुंह बंद करके इसे 15 दिनों के लिए रख देते हैं फिर इसे छानकर सेवन करें। इसे 7 से 10 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सेवन करें। इससे श्वास, दमा रोग नष्ट हो जाता है।
32. दांतों में कीड़े लगना : चिरमिटी की जड़ को कान पर बांधने से दांतों में लगे कीड़े नष्ट हो जाते हैं।
33. कंठरोग : चिरमिटी को पानी में उबालकर,
उसका पानी पलकों पर लगाने से आंखों की
सूजन, आंखों की
जलन, अभिष्यन्द
और पलकों पर होने वाली मवाद आदि रोग दूर हो जाते हैं।
34. रतौंधी (रात में दिखाई न देना) :
10 ग्राम
अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को शाम के समय भोजन करने के बाद रोजाना चबाकर सो जाने से
2 से 4
दिनों के बाद ही रतौंधी रोग समाप्त हो
जाता है।
अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को छाया में सुखाकर और फिर उसका चूर्ण बनाकर 5 ग्राम चूर्ण रात को पानी के साथ खाने से 4-5 दिन में रतौंधी रोग में आराम आने लगता है।
अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को गाय के पेशाब में घिसकर आंखों में लगाएं।
35. गर्भनिरोध : अपामार्ग की जड़ को स्त्री की योनि में बत्ती बनाकर रखने से स्थिर गर्भ भी नष्ट हो जाता है।
अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को छाया में सुखाकर और फिर उसका चूर्ण बनाकर 5 ग्राम चूर्ण रात को पानी के साथ खाने से 4-5 दिन में रतौंधी रोग में आराम आने लगता है।
अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को गाय के पेशाब में घिसकर आंखों में लगाएं।
35. गर्भनिरोध : अपामार्ग की जड़ को स्त्री की योनि में बत्ती बनाकर रखने से स्थिर गर्भ भी नष्ट हो जाता है।
36. मुंह का रोग : अपामार्ग की जड़ का काढ़ा बनाकर इसमें सेंधानमक
मिलाकर कुल्ला करने से गले, मुंह का दाना व होंठों का फटना बंद हो जाता है।
37. मूत्ररोग : अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ 5
ग्राम से 10 ग्राम या काढ़ा 15 ग्राम से 50 ग्राम को मुलेठी और गोखरू के साथ सुबह-शाम लेने से
पेशाब की जलन और सूजन दूर होती है।
38. कष्टार्तव (मासिक धर्म का कष्ट के साथ आना) : अपामार्ग की जड़ 10 ग्राम, कपास के फूल 10 ग्राम, गाजर के बीज 10 ग्राम को 250 ग्राम जल में उबालें। जब 20
ग्राम के लगभग जल शेष रह जाए तो इसे छानकर
रात्रि के समय पिलाने से सुबह ऋतुस्राव (माहवारी) बिना दर्द के होता है।
39. मृत्वत्सा दोष (गर्भ में बच्चे का मर जाना) : चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ के साथ लक्ष्मण बूटी की
जड़ को, एक रंग वाली
गाय (जिस गाय के बछड़े न मरते हो) के दूध में पीसकर खाने से पुत्र की आयु बढ़ती है
तथा गर्भ में बच्चे की मृत्यु नहीं होती है।
40. पथरी : 2 ग्राम अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को पानी के साथ पीस लें। इसे प्रतिदिन पानी
के साथ सुबह-शाम पीने से पथरी रोग ठीक होता है।
41. जलोदर (पेट में पानी का भरना) : चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ 5
से 10 ग्राम या जड़ का काढ़ा बनाकर 15
से लेकर 50 मिलीलीटर को मुलेठी और गोखरू के साथ रोज दिन में
सुबह और शाम खुराक के रूप में लेने से पेशाब की अम्लता कम हो जाती है और जलोदर में
लाभ होता है।
42. यकृत का बढ़ना : अपामार्ग का क्षार मठ्ठे के साथ एक चुटकी की
मात्रा से बच्चे को देने से बच्चे की यकृत रोग के मिट जाते हैं।
43. पेट का बढ़ा होना : चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ 5
ग्राम से लेकर 10
ग्राम या जड़ का काढ़ा 15
ग्राम से 50 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम कालीमिर्च के साथ
खाना खाने से पहले पीने से आमाशय का ढीलापन में कमी आकर पेट का आकार कम हो जाता
है।
44. पित्त की पथरी में : पित्त की पथरी में चिरचिटा की जड़ आधा से 10
ग्राम कालीमिर्च के साथ या जड़ का काढ़ा
कालीमिर्च के साथ 15 ग्राम से 50 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खाने से पूरा लाभ
होता है। काढ़ा अगर गर्म-गर्म ही खायें तो लाभ होगा।
45. नाक के रोग : अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को पीसकर नाक से सूंघने
से नकसीर (नाक से खून बहना) बंद हो जाता है।
46. गुल्म (वायु का गोला) : अपामार्ग की जड़, स्याह मिर्च पीसकर घी के साथ प्रयोग कर सकते हैं।
47. योनि का दर्द : 5 ग्राम अपामार्ग की जड़ और 5
ग्राम पुनर्नवा की जड़ को लेकर बारीक पीसकर
योनि पर लेप करने से योनि (भग) के दर्द से छुटकारा मिलता है।
48. पेट में दर्द होने पर : चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ को 5
ग्राम से 10 ग्राम या इसी का काढ़ा बनाकर 15
ग्राम से 50 ग्राम को कालीमिर्च के साथ खाना खाने से पहले सुबह
और शाम पिलाने से भोजन के न पचने के कारण होने वाले पेट का दर्द मिटता है और खाना
खाने के बाद पीने से अम्लदोष में आराम होगा।
49. गठिया रोग : अपामार्ग (चिचड़ा) के पत्ते को पीसकर,
गर्म करके गठिया में बांधने से दर्द व
सूजन दूर होती है।
50.
कण्ठमाला के लिए : अपामार्ग की जड़ की राख को खाने और गांठों पर
लगाने से कण्ठमाला रोग (गले की गांठे) समाप्त हो जाता है।
·
अपामार्ग के फल का चूर्ण लेने से मस्तक के कीड़े गिर जाते है और कफ
रोग में लाभ मिलता है।
·
श्वेत अपामार्ग की जड़ को अपने पास रखने से धन की बरक्कत होती है एवं
घर की आर्थिक स्थिति अच्छी बनी रहती है।
·
पुष्य नक्षत्र में श्वेत अपामार्ग की जड़ को लाकर फिर से अभिमंत्रित
करके उसे पीसकर तिलक लगाने से लोग आपके प्रभाव में वशीभूत होने लगते है।
·
अपामार्ग की पत्तियों को गुड़ में मिलाकर खाने हर प्रकार का ज्वर ठीक
हो जाता है।
·
जो लोग दन्त रोग से बहुत परेशान रहते है। वे अपामार्ग के पौधे को
जलाकर उसकी भस्म बनायें फिर नियमित रूप से अपने दाॅतों पर मलें। ऐसा करने से दान्त
रोग नष्ट हो जाते है।
तंत्र और
आयुर्वेद की एक बेहद अहम वनस्पति है अपामार्ग। आम बोलचाल की भाषा में चिरचिटा, चिड़चिड़ा, ओंगा
और लटजीरा जैसे नामों से ये पहचाना जाता है। देश के लगभग हर हिस्से में ये आराम से
मिल जाता है। इसके पौधे यत्र तत्र स्वतः ही उग जाते हैं। प्रायः एक वर्ष की आयु
होने पर पौधा सूख जाता है किन्तु कुछ दुर्लभ पौधे 10-15 वर्ष
की आयु भी प्राप्त कर लेते हैं उनके त्वक् और मूल भी विशिष्ट क्रियाओं में प्रयोग
होती है।
अपामार्ग की ऊंचाई लगभग 60 से 120 सेमी
होती है। आमतौर पर लाल और सफेद दो प्रकार के अपामार्ग देखने को मिलते हैं। सफेद
अपामार्ग के डंठल व पत्ते हरे रंग के, भूरे और सफेद रंग के
दाग
युक्त होते हैं। इसके अलावा फल चपटे
होते हैं, जबकि लाल
अपामार्ग का डंठल लाल रंग का और पत्तों पर लाल-लाल रंग के दाग होते हैं।
इस पर बीज नुकीले कांटे के समान लगते है
इसके फल चपटे और कुछ गोल होते हैं दोनों प्रकार के अपामार्ग के गुणों में समानता
होती है फिर भी सफेद
अपामार्ग श्रेष्ठ माना जाता है इनके
पत्ते गोलाई लिए हुए 1 से 5
इंच लंबे होते हैं चौड़ाई आधे इंच से ढाई इंच तक होती है- पुष्प
मंजरी की लंबाई लगभग
एक फुट होती है, जिस पर फूल लगते हैं, फल शीतकाल में लगते हैं और गर्मी में पककर सूख जाते हैं। इनमें से चावल के
दानों के समान बीज निकलते हैं।
इसकी दो प्रजातियां होती हैं सफेद और
लाल। तंत्र और आयुर्वेद दोनों में ही इसकी दोनों की प्रजातियों का उपयोग होता है।
इस वनस्पति को रवि-पुष्य नक्षत्र मे या
आवश्यकता होने पर विधि पूर्वक शुभ नक्षत्र में लाकर निम्न प्रयोग कर सकते हैं।
1. सन्तान प्राप्ति:-
सफेद अपामार्ग की जड़ को जलाकर भस्म बना
लें। फिर इस भस्म का नित्य गाय के दूध के साथ सेवन करें, संतान सुख प्राप्त होगा।
2. धन प्राप्ति:-
सफेद लटजीरे की जड़ अपने पास रखने से धन
लाभ, समृद्धि और कल्याण की
प्राप्ति होती है।
3. तिजारी ज्वर ( हर तीसरे
दिन आने वाला बुखार)
चिरचिटा (अपामार्ग या ओंगा) की जड़ को
लाल रंग के 7 धागों में
रविवार के दिन लपेटकर रोगी
चिरचिटाकी कमर में बांध देने से `तिजारी बुखार´ चला
जाता है।
4. सर्वजन वशीकरण
अपामार्ग, भृंगराज, लाजवन्ती, सहदेवी के मूल समभाग घिस कर तिलक करने से सर्वजन वशीकरण होता है।
5. सम्मोहन
इसकी जड़ का तिलक माथे पर लगाने से
सम्मोहन प्रभाव उत्पन्न हो जाता है।
6. वाक् सिद्धि
इसकी डंडी की दातून 6 माह तक करने से वाक सिद्धि होती है।
किन्तु यह अत्यंत दुष्कर है किसी न किसी कारण से क्रम टूट जाता है।
7. भूख बन्द
इसके बीजों को साफ करके चावल निकाल लें
और दूध में इसकी खीर बना कर खाएं, भूख का अनुभव नहीं होगा। ( ये सिद्ध प्रयोग है किन्तु किसी जानकर के
सानिध्य में ही करना चाहिए क्योंकि ये पेट बांध देता है अर्थात भूख के साथ साथ मल
भी बन्द हो जाता है और लोगो को गर्मी, बेचैनी, ऐंठन मरोड़ हो जाते हैं अतः बिना विरेचन जाने ये प्रयोग नहीं करना
चाहिए)
8. विष नाश
विषनाश का मन्त्र पढ़कर इसकी 7 टहनियां लेकर सर्प, बिछू या ततैया के काटे स्थान पर झड़ने से विष उतर जाता है।
9. ऊपरी बाधा
यदि घर में ऊपरी बाधाओ का उपद्रव हो तो
अपमार्ग और काले धतूरे के पौधे को जड़ समेत उखाड़ कर घर में गड्ढा कर उल्टा गाड़ने से
उपद्रव शांत होते हैं।
10. रक्षा हेतु
अभिमन्त्रित श्वेत अपामार्ग-मूल को
ताबीज में भर कर
लाल,पीले या हरे धागे में गूंथकर गले वा वांह में धारण करने
से शत्रु, शस्त्र आदि से रक्षा होती है।
11. वंचित प्रश्नों के उत्तर पाना
अभिमन्त्रित श्वेत अपामार्ग-मूल को
चूर्ण करके हरे रंग के नवीन कपड़े में लपेट कर वर्तिका बना,तिल तेल का दीपक प्रज्ज्वलित करें।उस
दीपक को एकान्त में रखकर उसकी लौ पर ध्यान केन्द्रित करने से वांछित दृश्य देखे जा
सकते हैं। मान लिया किसी चोरी गई वस्तु की,अथवा गुमशुदा
व्यक्ति के बारे में हम जानना चाहते हैं,तो इस प्रयोग को
किया जा सकता है।
(आपका ध्यान जितना
केन्द्रित होगा, दृश्य और
आभास उतना ही स्पष्ट होगा। ये विद्या /
सिद्धि लम्बे अभ्यास के बाद मिलती है, जो लोग निरन्तर त्राटक अभ्यास करते हैं उन्हें शीघ्र सफलता मिल सकती है)
१२. स्त्री वशीकरण
अपने वीर्य में अपामार्ग की जड़ , धतूरे की जड़, हरताल
घोंट कर किसी स्त्री को 25 ग्राम खिला देने पर वशीकरण होता
है।
|| अपामार्ग के अदभुत औषिधय गुण
||
आइये जाने ये किस-किस काम में और
क्या-क्या प्रयोग में काम आती है -
1. गुर्दे की पथरी (Kidney
stone)
लगभग 1 से 3 ग्राम चिरचिटा के पंचांग का
क्षार बकरी के दूध के साथ दिन में 2 बार लेते हैं। इससे
गुर्दे की पथरी गलकर नष्ट हो जाती है।
5 ग्राम से 10 ग्राम चिरचिटा की जड़ का काढ़ा 1 से 50 ग्राम सुबह- शाम मुलेठी, गोखरू और पाठा के साथ खाने
से गुर्दे की पथरी खत्म हो जाती है। इसकी क्षार अगर भेड़ के पेशाब के साथ खायें तो
गुर्दे की
पथरी में ज्यादा लाभ होता है।
2. खूनी बवासीर (Bloody
piles)
चिरचिटा की 25 ग्राम जड़ों को चावल के पानी में
पीसकर बकरी के दूध के साथ दिन में 3 बार लेने से खूनी बवासीर
ठीक हो जाती है।
3. कुष्ठ (Leprosy)
चिरचिटा के पंचांग का काढ़ा लगभग 14 से 28 मिलीलीटर
दिन में 3 बार सेवन करने से कुष्ठ (कोढ़) रोग ठीक हो जाता
है।
4. हैजा(Cholera)
चिरचिटा की जड़ों को 3 से 6 ग्राम तक
की मात्रा में बारीक पीसकर दिन में 3 बार देने से हैजा में
लाभ
मिलता है।
5. शारीरिक दर्द (Physical
pain)
चिरचिटा की लगभग 1 से 3 ग्राम
पंचांग का क्षार नींबू के रस में या शहद के साथ दिन में 3 बार
देने से
शारीरिक दर्द में लाभ मिलता है।
6. तृतीयक बुखार (Tertiary
fever)
इसकी ढाई पत्तियों को गुड़ में मिलाकर दो
दिन तक सेवन करने से पुराना ज्वर उतर जाता है।
7. खांसी (cough)
चिरचिटा को जलाकर, छानकर उसमें उसके बराबर वजन की चीनी
मिलाकर 1 चुटकी दवा मां के दूध के साथ रोगी को देने से खांसी
बंद हो जाती है।
8. आंवयुक्त दस्त (Dysentery
diarrhea)
चिरचिटा के कोमल के पत्तों को मिश्री के
साथ मिलाकर अच्छी तरह पीसकर मक्खन के साथ धीमी आग पर रखे जब यह गाढ़ा हो जाये तब
इसको खाने से ऑवयुक्त दस्त में लाभ मिलता है।
9. बवासीर (Hemorrhoids)
250 ग्राम चिरचिड़ा का रस,
50 ग्राम लहसुन का रस, 50 ग्राम प्याज का रस
और 125 ग्राम सरसों का तेल
इन सबको मिलाकर आग पर पकायें। पके हुए
रस में 6 ग्राम मैनसिल को
पीसकर डालें और 20 ग्राम मोम डालकर महीन मलहम (पेस्ट)
बनायें। इस मलहम को
मस्सों पर लगाकर पान या धतूरे का पत्ता
ऊपर से चिपकाने से बवासीर के मस्से सूखकर ठीक हो जाते हैं।
चिरचिटा के पत्तों के रस में 5-6 काली मिर्च पीसकर पानी के साथ पीने
से बवासीर में आराम मिलता है।
10. पक्षाघात-लकवा-फालिस-
परालिसिस (Stroke-paralysis-Falis- paralysis)
एक ग्राम कालीमिर्च के साथ चिरचिटा की
जड़ को दूध में पीसकर नाक में टपकाने से लकवा या पक्षाघात ठीक हो जाता है।
11. जलोदर (Dropsy)
चिरचिटा का चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग की
मात्रा में लेकर पीने से जलोदर (पेट में
पानी भरना) की सूजन कम होकर समाप्त हो जाती है।
12. शीतपित्त (Urticaria)
अपामार्ग (चिरचिटा) के पत्तों के रस में
कपूर और चन्दन का तेल मिलाकर शरीर पर मालिश करने से शीतपित्त की खुजली और जलन खत्म
होती है।
13. घाव -व्रण( wound)
फोड़े की सूजन व दर्द कम करने के लिए
चिरचिटा, सज्जीखार अथवा
जवाखार का लेप बनाकर फोड़े पर
लगाने से फोड़ा फूट जाता है, जिससे दर्द व जलन में रोगी को आराम
मिलता है।
14 . उपदंश -सिफलिस( Syphilis)
चिरचिटा की धूनी देने से उपदंश के घाव
मिट जाते हैं। 10 ग्राम
चिरचिटा की जड़ के रस को सफेद जीरे के 8 ग्राम चूर्ण के साथ
मिलाकर पीने से उपदंश में बहुत लाभ होता है। इसके साथ रोगी को मक्खन भी साथ
में खिलाना चाहिए।
15. नाखून की खुजली (Nail
itch)
चिरचिटा के पत्तों को पीसकर रोजाना 2 से 3 बार लेप
करने से नाखूनों की खुजली दूर हो जाती है।
16. नासूर (Ulcer)
नासूर दूर करने के लिए चिरचिटे की
पत्तियों को पानी में पीसकर रूई में लगाकर नासूर में भर दें। इससे नासूर मिट जाता
है।
17. शरीर में सूजन (Inflammation
in the
body)
लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में चिरचिटा खार, सज्जी खार और जवाखार को लेकर पानी में पीसकर सूजन वाली गांठ पर लेप
की तरह सेलगाने से सूजन दूर हो जाती है।
18. बच्चों के रोगों में लाभकारी
( Beneficial Children's Diseases)
अगर बच्चे की आंख में माता (दाने) निकल
आये तो दूध में मूल को घिसकर आंख में काजल की तरह लगाएं।
19. बिच्छू का जहर(Poison
Scorpion)
जिस बच्चे या औरत-आदमी के बिच्छू ने डंक
मारा हो,उसे चिरचिटे की
जड़ का स्पर्श करायें अथवा 2 बार
दिखायें। इससे जहर उतर जाता है।
अन्य किसी जानकारी, समस्या समाधान और कुंडली विश्लेषण हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।चिरचिटा स्थानीय
लोगों में बहुत प्रसिद्ध है इसको सभी लोग चिरचिटा के नाम से ही जानते हैं इसे हाथ
से छूने पर कांटे लग जाते हैं जिसके कारण इसका नाम चिरचिटा पड़ा इसे अपामार्ग भी कहते
हैं यह दो प्रकार की होती है एक अपामार्ग का पौधा लाल रंग का होता है जिसकी
डंडियां कुछ लाल के रंग की होती है इसी को लाल अपामार्ग कहते हैं दूसरी प्रकार का
अपामार्ग सफेद रंग का होता है इसमें सफेद फूल आते हैं जिसके कारण उसका नाम सफेद
अपामार्ग पड़ गया इसकी की जड़ की भस्म बनाकर दूध के साथ पति पत्नी दोनों पी ले तो
इससे संतान लाभ प्राप्त होता है दूसरा प्रयोग है चिरचिटा के दानों को साफ करके दूध
में डालकर इसकी खीर बना ली जाए और जब खीर अच्छी तरह पक कर तैयार हो जाए तब उस खीर
को खाने से कई दिनों तक भूख नहीं लगती जंगलों में संत महात्मा जब कोई साधना करना
चाहते हैं तब वह इस प्रकार की खीर बनाकर खा लेते हैं उसके बाद 10-
12 दिनों तक आराम से साधना करते रहते हैं जिससे कि उन्हें मल मूत्र
त्याग नहीं करना पड़ता | दूसरी प्रकार का
पौधा जो सफेद रंग का पाया जाता है जिस में सफेद फूल लगते हैं यह पौधा तंत्र की
दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है इस पौधे को घर पर लाकर अपनी तिजोरी में
रख देने से आर्थिक लाभ होता रहता है | और इसकी जड़ को
पीसकर चंदन की भांति तिलक करने से वशीकरण शक्ति प्राप्त होती है यह तांत्रिक
प्रक्रिया है|
दूसरा प्रयोग इसकी जड़ की बत्ती को दीपक में जलाकर अदृश्य दृश्य
प्रयोग सिद्ध किया जाता है और इसे करने के बाद वह व्यक्ति किसी को दिखाई नहीं
पड़ता यह भी तंत्र का एक प्रयोग है|
तीसरा प्रयोग बहेड़े की जड़ के साथ इसकी जड़ को मिलाकर उच्चाटन
प्रयोग संपन्न किया जाता है | इसकी पत्तियों
को पीसकर बिच्छू काटे स्थान पर लगाने से बिच्छू का विष उतर जाता है |
या इसकी पत्तियों को जलाकर बिच्छू काटने की जगह पर धूआं दिखा
दिया जाए तो बिच्छू का जहर बहुत जल्दी उतर जाता है |
इस प्रकार से अपामार्ग का कई प्रकार से प्रयोग किया जाता है इस
पौधे को कांटे होने की वजह से कोई पशु भी नहीं खाता |इसके अलावा
प्रसव के समय अपामार्ग की जड़ को पीसकर प्रसव होने से पूर्व दादी के चारों तरफ लगा
दिया जाए नाभि के चारों तरफ लगा दिया जाए तो आसानी से प्रसव हो जाता है प्रसव होने
के बाद जो नाभि के चारो तरफ लगा हुआ है उस पेस्ट को तुरंत पहुंच देना चाहिए नहीं
तो बच्चेदानी बहार निकल आएगी इसलिए इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए।अपामार्ग से वशीकरण का अचूक उपाय – अपामार्ग से वशीकरण कैसे करें ?
अपामार्ग
से वशीकरण टोटके अश्विनी नक्षत्र में ही करना चाहिए | अश्विनी
नक्षत्र में अपामार्ग की जड़ को तोड़ कर ले आएं और घर लाने के बाद इस जड़ को पत्थर पर
घिस ले, यह ध्यान रखे की इसे कुटना नही है इसे बस पत्थर पर घिसना हैं और
इसे थोङे से पानी में मिलाकर सिर पर तिलक लगाने से आप मे एक सम्मोहन शक्ति आ जाएगी
आप जहां भी जाएगे वहा सब लोग आपकी तरफ आकर्षित होने लगेंगे |
१) लाल अपामार्ग की टहनी का आप दातुन
के रूप में प्रयोग करें तो आप के शब्दों और वाणी में सम्मोहन पैदा करने की ताकत आ
जाएगी। आप किसी को भी कुछ भी कहेंगे वह आप की बात मानेगा। यह मंजन अथवा दातुन छ:
महीनों तक प्रतिदिन सवेरे करें।
२) इस पौधे की जड़ को किसी पुष्य
नक्षत्र में घर पर ले आएं। इसे पानी की सहायता से पत्थर पर पीसकर उसका पेस्ट बना
लें। अब इस पेस्ट का तिलक लगाकर उस व्यक्ति के सामने जाए जिसे आप को वशीभूत करना
है, वह आपके वशीभूत हो जाएगा। अपामार्ग से वशीकरण टोटके का यह एक सरल
टोटका है।
३) अपामार्ग, लाजवंती, सहदेवी
मूल और भृंगराज सभी एक समान मात्रा में मिलाकर पीस लें व इसका पेस्ट बना लें। इसे
अपने मस्तक पर तिलक के रूप में लगाएं और उस व्यक्ति के पास जाए जिसे आप वशीभूत
करना चाहते हैं। इस तिलक लगाए हुए आप के चेहरे को देखते ही वह आपके सम्मोहन में आ
जाएगा।
४)
अपामार्ग पौधे की जड़ को
अश्विनी नक्षत्र वाले दिन आप लेकर आए। इसे एक ताबीज में डालकर दें। इस ताबीज को
अपने गले में धारण कर कर लें। इसके प्रभाव से जिसे चाहेंगे वह आप के वशीभूत हो जाएगा।
५) अपामार्ग की जड़ को अपने पर्स में
रखें जब आप किसी मुकदमे या इंटरव्यू के लिए जा रहे हो। इस जड़ के पास में रहने से
संबंधित मुकदमा या इंटरव्यू से संबंधित व्यक्ति आपके वश में हो जाएगा और आपके
अनुकूल ही फैसला लेगा।
६)
श्वेत अपामार्ग मूल को
अभिमंत्रित कर लें। आप इसे एक ताबीज में भर ले तथा ताबीज को पीले, लाल या
हारे धागे में बाँध कर अपनी बाँह अथवा गले में धारण करें। इससे आप का शत्रु आपके
वश में हो जाएगा और कभी भी आपके विरुद्ध नहीं जाएगा।
७) शुभ दिन देखकर श्वेत अपामार्ग का
पौधा जड़ सहित उखाड़ लें। इस समय आप नीचे दिए गए मंत्र का २१ वार जाप करें। अब इस
जड़ को आप अपने घर ले आए और शुद्ध जल से साफ कर अपने पूजा स्थान में स्थापित करें।
अब सात दिनों तक प्रतिदिन इसे धूप दिखाए व उसी मंत्र का जाप करें जिस मंत्र का जाप
आपने पौधा उखाड़ने के वक्त किया था। जाप संख्या रखें प्रतिदिन एक माला की। सात दिन
बाद इस जड़ को शुद्ध घी की सहायता से पीसकर पेस्ट बनाकर रख लें। अब जब किसी को आप
को वश में करना है उस समय मंत्र को दोहराते हुए इस पेस्ट से तिलक लगाकर उसके पास
जाए, वह व्यक्ति आपके वश में होगा ही होगा। मंत्र है- “ओम्
ह्वैं श्रीं नमः।”
८) अपामार्ग के फूलों की माला अगर कोई
व्यक्ति धारण करके रखता है तो उसके संपर्क में आने वाले सभी व्यक्ति उसके वशिभूत
हो जाते हैं।
९) अपामार्ग की जड़, हरताल व
धतूरे की जड़ को मिलाकर अपने वीर्य से घोट लें। अब जिस स्त्री को आप को वश में
करना है उसे यह खिला दे लगभग २५ ग्राम की मात्रा में, वह आपके
वश की हो जाएगी।
१०)
अश्विनी नक्षत्र वाले दिल आप
अपामार्ग के एक पौधे को जड़ सहित मिट्टी से उखाड़ लें। यह कार्य आप सूर्योदय या
सूर्यास्त के पूर्व करें। अब पौधे की जड़ को तोड़ कर ले लें और तने को वहीं पर
फेंक दें। इस जड़ को आप अपने जेब में रखे उस वक्त जब आप किसी को अपने वश में करना
चाहते हों, वशीकरण का प्रभाव देखने को मिलेगा।
·
निसंतान दंपत्ति अपामार्ग के पौधे के प्रयोग से संतान सुख को
प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें इस पौधे की जड़ को जलाकर उसकी भष्म बना लेनी
चाहिए। इसे गौ-दूग्ध में मिला कर संतान प्राप्ति की इच्छुक स्त्री को पिला दे
प्रतिदिन। जल्द ही फल की प्राप्ति होगी।
·
अगर किसी को व्यक्ति को किसी जहरीले जानवर यानि बिच्छू, सांप या
कोई कीड़ा ने काट लिया है तो उसके दंश वाले स्थान पर ताजा रस लगाएं अपामार्ग के
पत्तों का तथा दिन में दो बार दो-दो चम्मच इन पत्तों का रस पिला दिया जाए तो विष
का असर तुरंत कमजोर पड़ जाता है तथा व्यक्ति को दर्द व जलन से आराम मिल जाता है।
अगर उसके कटे हुए स्थान पर सूजन हो गई हो तो इन पत्तों को पीसकर इसकी लुगदी को लगा
दे दंश वाले स्थान पर, सूजन में कमी आ जाती है।
·
इस पौधे की जड़ को अगर किसी की तिजोरी में स्थान दिया जाए तो वहां
पर धन की कभी भी कमी नहीं होगी अर्थात धन संबंधी सारी परेशानियों से निजात पाया जा
सकता है।
·
किसी के दांत पर अगर दर्द हो तो अपामार्ग की टहनी से वह दातुन करें
तो दांत का दर्द खत्म हो जाता है तथा मसूड़ों में खून आ रहा होता है तो वह भी बंद
हो जाता है।
·
इसके पत्तों का रस अगर रूई के फोहे की सहायता से दांत दर्द वाले
स्थान पर रखा जाए तो दांत का दर्द खत्म हो जाता है।
·
प्रसव पीड़ा में पुष्य नक्षत्र वाले दिन में तोड़े गए सफेद
अपामार्ग की जड़ को काले कपड़े में बांधकर संबंधित स्त्री के गले या कमर में
बांधने से निजात मिलेगी। प्रसव के बाद इसे गर्भवती के शरीर से हटा दें वरना
गर्भाशय के भी बाहर निकलने की संभावना रहती है।
·
मियादी बुखार में भी यह पौधा बहुत ही लाभकारी सिद्ध हुआ है। इसके
लिए इस पौधे के फूल की माला को बनाकर बुखार से पीड़ित व्यक्ति को अगर पहना दिया
जाए तो उसका बुखार से निरस्तीकरण हो जाता है।
कोई भी साधक इसका प्रयोग अपने जीवन
में किसी काबू करने के लिए कर सकता है| जाने अपामार्ग वशीकरण मंत्र प्रयोग
टोटके कैसे करें और इसकी जड़ से वशीकरण तिलक बनाकर सर पे लगाकर किसी को भी वशीभूत
करे| कोई भी अपामार्ग तंत्र टोटके को अपने
जीवन में प्रयोग करने से पहले इसको साधना या सिद्धि हासिल करना जरुरी है इसलिए
गुरु जी सलाह लेकर ही कार्य की शुरुवात करे|
सम्मोहन शक्ति के अन्य प्रयोग:
- लाल अपामार्ग की टहनी से 6
मास तक दातून करने
पर वाणी में सम्मोहन और वचन सिद्धि का प्रभाव उत्पन्न होता है।
- इसी पौधे की जड़ ले आयें,
उसकी भस्म बनाकर
दूध के साथ पीने से संतानोत्पत्ति की स्थिति बनती है। स्त्री पुरुष दोनों को
पीना चाहिये।
- इसके बीजों का चावल निकाले। उन चावलों की खीर
खाने से भूख मर जाती है।
- सफेद लटजीरे की जड़ किसी शुभ-मुहूर्त में लाकर
पास रखें। यह कल्याणकारी होती है।
- इसकी जड़ किसी शुभ-मुहूर्त में लाकर पीसें और
तिलक करें इस तिलक में वशीकरण की शक्ति होती है।
- बहेड़ा और अपामार्ग (श्वेत) की जड़ंे लेकर शत्रु
के घर में डालने से उसका परिवार उच्चाटन ग्रस्त हो जाता है।
- विच्छू के डंक मारने पर इसकी पत्ती पीसकर लगा
दें विष उत्तर जायेगा। इसकी लकड़ी भी बिच्छू का विष दूर कर देती है।
- इसकी जड़ का लेप शस्त्र प्रहार से रक्षा करता
है।
- सोंठ की माला पहनने से ज्वर उतर जाता है।
- श्वेत कनेर की जड़ को दायें हाथ में बांधने से
ज्वर शांत हो जाता है।
- सफेद मदार की जड़ धारण करने से नजर और प्रेत
बाधा दूर हो जाती है।
- सहदेवी पौधे की जड़ के सात टुकड़े करके कमर में
बांधने से अतिसार रोग मिट जाता है।
- सफेद धुंधची की जड़ घिसकर सूंघने और उसे कान पर
बांधने से आधा शीशी का दर्द मिट जाता है।
- सेहुंड की जड़ दांतों तले दबाने से दंतकीट नष्ट
हो जाते हैं।
- लोबान की जड़ गले में बांधने से खांसी दूर हो
जाती है।
- सफेद धुंधुची की जड़ सिर के नीचे रखने से
अनिद्रा रोग मिट जाता है।
- तिल्ली का रोग दूर करने के लिए गले में प्याज
की माला पहनना लाभदायक है।
- कमल के बीज और चावल बकरी के दूध में पीसकर खीर
बनायें। यह खीर खाने वालों को चार दिन तक भूख नहीं लगती।
- सत्यानाशी की जड़ पान में खिलाने से बिच्छू का
जहर उतर जाता है।
मोहिनी वशीकरण टोटके/यंत्र,
प्यार के लिए मोहिनी मंत्र,
तेल मोहिनी साधना/कलुआ मोहिनी
साधना/विश्व मोहिनी साधना- भारतीय
तंत्र विद्या में मोहिनी वशीकरण मंत्र साधना को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है|
प्राचीनकाल में बड़े-बड़े साधक इस
विद्या में सिद्धि प्राप्त कर इसका उपयोग जन कल्याण हेतु करते थे|
पौराणिक ग्रंथो में देवी मोहिनी
अद्भुत शक्ति से युक्त अनिर्वाचनीय सौन्दर्य की स्वामिनी महाशक्ति योगमाया हैं|
कहते हैं समुद्र मंथन के समय,
अमृत बँटवारे के दौरान भगवती योगमाया
भगवान विष्णु के शरीर में सूक्ष्म रूप से प्रवेश कर गई थीं,
परिणामस्वरूप विष्णु के स्त्री रूप को
देखते ही वहाँ उपस्थित समस्त दानव सम्मोहित हो गए थे|साधारणतया मोहिनी वशीकरण मंत्र
साधना का उपयोग मनचाहा प्यार पाने में
अथवा पारिवारिक जीवन में मधुरता लाने के लिए किया जाता है,
जबकि कुछ साधक ऐसे भी होते हैं जो
मात्र सिद्धि के उच्च शिखर पर पहुँचने के लिए यह साधना करते हैं|
मोहिनी वशीकरण मंत्र साधना
नीचे मोहिनी विद्या में वर्णित कुछ
प्रसिद्ध टोटके दिये जा रहे हैं, जिनका
उपयोग साधारण मनुष्य भी कर सकता है|
मोहिनी वशीकरण टोटके/यंत्र
- मदार का दूध, विदारी कंद, वट वृक्ष की जटा को चिता भस्म के साथ मिश्रित
कर लगभग तीन घंटे तक घोंटने के पास किसी शीशी में सुरक्षित रख लें| इस मिश्रण का तिलक लगाने के उपरांत जिस किसी
से नज़र मिलती है वह उसके वश में आ जाता है|
- अपामार्ग की जड़, हरताल तथा
धतूरे की जड़ को स्व वीर्य में घोंटकर 25 ग्राम की मात्रा में किसी स्त्री को पिला दें| वह सम्मोहित हो जाएगी|
- श्मशान की महानीली की जड़ को कूट लें तथा रुई में मिलाकर बत्ती बना
लें|
अब चमेली के तेल से दीपक जलाएँ और काजल बनाएँ| इस काजल को लगाने के बाद जिससे दृष्टि मिले
वह वशीभूत हो जाता है|
- हवा में उड़कर आया कोई भी पत्ता, तगर, अर्जुन की छाल
और मजीठ समान मात्रा में लें तथा उसे मिश्रित करें| 12 घंटे के बाद जिसे वश में करना हो उसके ठोस
अथवा पेय आहार में मिला दें, वह वश में आ जाएगा|
शुभ मुहूर्त में आसन लगाएं तथा बिना हिलेडुले
रुद्राक्ष की माला पर निम्नलिखित मंत्र का 11 माला जाप करें –
जाप के पश्चात सरसो के तेल से हवन में
आहुति दें तथा 108 बार इस मंत्र का पाठ करें|
पूर्ण आहुति के पश्चात मंत्रोचारण के
साथ नींबू की बलि दें, तथा
थोड़ा उसी नींबू का थोड़ा सा रस हवन कुंड में निचोड़ दें|
इसके पश्चात मंत्र सिद्ध हो जाता है|
हवन के समय लाल वस्त्र धारण करें तथा
पश्चिम दिशा में मुख कर बैठें| इसके
बाद हत्थाजोड़ी, पायजोड़ी,
इंद्रजाल,
मोहिनीजाल तथा मायाजाल नामक जड़ीबूटी
एकत्र करें| इन सभी सामग्रियों को मिश्रित
कर चूर्ण बनाकर रख लें| प्रयोग
के समय थोड़ा सा चूर्ण लेकर 108 बार
इस मंत्र का जाप करें तथा 3 बार
फूँक मारें तथा जिसे वश में करना हो उसे किसी आहार में मिलाकर खिला दें|
इसे खाने के बाद वह व्यक्ति आपके वश
में आ जाएगा| यह साधना सरल है परंतु समस्त
सामग्री जुटाना कठिन अवश्य है| परंतु
कहते हैं ना ‘जहां चाह वहाँ राह
तेल मोहिनी साधना विधि
नित्य सरसो के तेल का दीपक जलाकर 41
दिनों तक निम्नलिखित मंत्र का दो घंटे
तक पाठ करें-
तेल तेल गौरी का खेल
राजा प्रजा कौन्सल
चलके मेरे और मेरे परिवार के
पैरी मेल
मन मोहे तन मोहे मोहे सभी शरीर
मोहे पंजे पीर
जय फूला कम करे खुल्ला
मलंगी तोड़े तंगी
इन 41 दिनों के मध्य कठोर ब्रम्हचर्य का पालन करें|
प्रथम दिन तथा अंतिम दिन सात किस्म की
मिठाइयाँ किसी भी सुनसान स्थान पर रख दें और लौट जाएँ|
वापस लौटते समय पीछे मुड़कर न देखें|
41 दिन के बाद यह मंत्र सिद्ध हो जाता है|
इसके बाद,
यदि किसी पर इस मंत्र का उपयोग करना
हो, तो इस मंत्र का उच्चारण 21
बार करते हुए सरसो के तेल पर फूँक
मारें तथा उस तेल से अपने शरीर की मालिश करें| इसके बाद आप जिस किसी के पास जाएंगे वह आपसे सम्मोहित हो
जाएगा|
विश्व मोहिनी साधना विधि
इस साधना से व्यक्तित्व में गज़ब का
आकर्षण आ जाता है| यहाँ
तक कि आपकी बोल-चाल, उठने
बैठने की शैली भी सम्मोहक हो जाती है| इस साधना का उपयोग वैवाहिक जीवन में मधुरता लाने के लिए
अत्यंत लाभदायक है| स्त्री
तथा पुरुष दोनों समान रूप से इस साधना के द्वारा अपने जीवन को संवार सकते हैं|
साधना विधि
देवी योगमाया की प्रतिमा स्थापित कर,
उन्हें सुगंधित जल से स्नान कराएं,
इत्र तथा चुनरी अर्पित करते हुए
प्रतिमा का सोलह श्रंगार करें| प्रसाद
में सात प्रकार की मिठाई रखेँ| पूजन
हेतु स्वयं लाल वस्त्र धारणकर पूर्व दिशा की और मुख कर बैठें|
देवी की प्रतिमा के सम्मुख तिल की
ढेरी लगाकर उस पर तिल के तेल का दीपक रख दें| लाल रंग का पुष्प चढ़ाएँ तथा पंचोपचार विधि से पूजन करें|
तत्पश्चात स्फटिक की माला पर
निम्नलिखित मंत्र का 9000 हजार
जाप का संकल्प लेकर एकादशी से प्रारम्भ करें –
मंत्र दृॐ ह्रीं सर्व चक्र मोहिनी जाग्रय जाग्रय ॐ हुं
स्वाहा !!
यह साधना सात दिनों में पूर्ण किया जा
सकता है| इसके लिए एक दिन में आपको 16
माला जाप करना होगा|
साधना के दौरान ब्रम्हचर्य का पालन
करें| साधना के पश्चात श्रंगार
सामाग्री किसी कुंवारी कन्या को दान कर दें अथवा कुछ दक्षिणा के साथ मंदिर में
अर्पित कर दें| साधना समाप्त होते ही स्त्रियाँ
अप्रतिम सौन्दर्य की स्वामिनी बन जाती है तथा पुरुषों में अद्भुत आकर्षण व्याप्त
हो जाता है| इसकी सिद्धि से आप समस्त तनाव
से मुक्त होकर जीवन की किसी भी समस्या का सामना करने में समर्थ हो जाते हैं|
कलुआ मोहिनी साधना
यह साधना प्रेम में असफल रहे इंसान के
लिए अथवा एकतरफा प्रेम करने वाले प्रेमियों के लिए अत्यंत लाभदायी है|
विधि: रात के समय 21
दिनों तक एकांत कक्ष में एक गोला
बनाएँ, तथा निम्नलिखित मंत्र का 10
माला जाप करें –
काला कलुआ काली रात
मैं जगावां आधी रात
सूती को जगाके बैठी को उठाके
मेरे पास ले आना
चले मन्त्र फुरे
देखा कलुआ तेरे मन्त्र का तमाशा।
मैं जगावां आधी रात
सूती को जगाके बैठी को उठाके
मेरे पास ले आना
चले मन्त्र फुरे
देखा कलुआ तेरे मन्त्र का तमाशा।
जाप के समय खोये के पेड़े का प्रसाद
चढ़ाएँ तथा किसी भी तेल तेल का दीपक जलाएँ| अगले दिन प्रसाद किसी सुनसान स्थान पर रख दें|
जिस व्यक्ति पर इस मंत्र का प्रयोग
करना हो उसके चित्र के सम्मुख हर दिन एक इस मंत्र का एक माला जाप करें या जिस दिन
मिलना हो 21 बार इसका उच्चारण करने के बाद
उससे मिलें|
इस अचूक साधना से इछित प्रेम अवश्य
प्राप्त होता है, तथापि दुर्भावना से प्रेरित
होकर इसका प्रयोग न करें|१. मोर की कलगी रेश्मी वस्त्र में बांधकर जेब
में रखने से सम्मोहन शक्ति बढ़ती है।
२. श्वेत अपामार्ग की जड़ को घिसकर तिलक करने से सम्मोहन शक्ति बढ़ती है।
३. स्त्रियां अपने मस्तक पर आंखों के मध्य एक लाल बिंदी लगाकर उसे देखने का प्रयास करें। यदि कुछ समय बाद बिंदी खुद को दिखने लगे तो समझ लें कि आपमें सम्मोहन शक्ति जागृत हो गई है।
४. गुरुवार को मूल नक्षत्र में केले की जड़ को सिंदूर में मिलाकर पीस कर रोजाना तिलक करने से आकर्षण शक्ति बढ़ती है।
५. गेंदे का फूल, पूजा की थाली में रखकर हल्दी के कुछ छींटे मारें व गंगा जल के साथ पीसकर माथे पर तिलक लगाएं आकर्षण शक्ति बढ़ती है।
६. कई बार आपको यदि ऐसा लगता है कि परेशानियां व समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। धन का आगमन रुक गया है या आप पर किसी द्वारा तांत्रिक अभिकर्म'' किया गया है तो आप यह टोटके अवश्य प्रयोग करें, आपको इनका प्रभाव जल्दी ही प्राप्त होगा।
तांत्रिक अभिकर्म से प्रतिरक्षण हेतु उपाय
१. पीली सरसों, गुग्गल, लोबान व गौघृत इन सबको मिलाकर इनकी धूप बना लें व सूर्यास्त के 1 घंटे भीतर उपले जलाकर उसमें डाल दें। ऐसा २१ दिन तक करें व इसका धुआं पूरे घर में करें। इससे नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं।
२. जावित्री, गायत्री व केसर लाकर उनको कूटकर गुग्गल मिलाकर धूप बनाकर सुबह शाम २१ दिन तक घर में जलाएं। धीरे-धीरे तांत्रिक अभिकर्म समाप्त होगा।
३. गऊ, लोचन व तगर थोड़ी सी मात्रा में लाकर लाल कपड़े में बांधकर अपने घर में पूजा स्थान में रख दें। शिव कृपा से तमाम टोने-टोटके का असर समाप्त हो जाएगा।
४. घर में साफ सफाई रखें व पीपल के पत्ते से ७ दिन तक घर में गौमूत्र के छींटे मारें व तत्पश्चात् शुद्ध गुग्गल का धूप जला दें।
५. कई बार ऐसा होता है कि शत्रु आपकी सफलता व तरक्की से चिढ़कर तांत्रिकों द्वारा अभिचार कर्म करा देता है। इससे व्यवसाय बाधा एवं गृह क्लेश होता है अतः इसके दुष्प्रभाव से बचने हेतु सवा 1 किलो काले उड़द, सवा 1 किलो कोयला को सवा 1 मीटर काले कपड़े में बांधकर अपने ऊपर से २१ बार घुमाकर शनिवार के दिन बहते जल में विसर्जित करें व मन में हनुमान जी का ध्यान करें। ऐसा लगातार ७ शनिवार करें। तांत्रिक अभिकर्म पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा।
६. यदि आपको ऐसा लग रहा हो कि कोई आपको मारना चाहता है तो पपीते के २१ बीज लेकर शिव मंदिर जाएं व शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाकर धूप बत्ती करें तथा शिवलिंग के निकट बैठकर पपीते के बीज अपने सामने रखें। अपना नाम, गौत्र उच्चारित करके भगवान् शिव से अपनी रक्षा की गुहार करें व एक माला महामृत्युंजय मंत्र की जपें तथा बीजों को एकत्रित कर तांबे के ताबीज में भरकर गले में धारण कर लें।
७. शत्रु अनावश्यक परेशान कर रहा हो तो नींबू को ४ भागों में काटकर चौराहे पर खड़े होकर अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए चारों दिशाओं में एक-एक भाग को फेंक दें व घर आकर अपने हाथ-पांव धो लें। तांत्रिक अभिकर्म से छुटकारा मिलेगा।
८. शुक्ल पक्ष के बुधवार को ४ गोमती चक्र अपने सिर से घुमाकर चारों दिशाओं में फेंक दें तो व्यक्ति पर किए गए तांत्रिक अभिकर्म का प्रभाव खत्म हो जाता है।
सिद्ध वशीकरण मन्त्र
१॰ “बारा राखौ, बरैनी, मूँह म राखौं कालिका। चण्डी म राखौं मोहिनी, भुजा म राखौं जोहनी। आगू म राखौं सिलेमान, पाछे म राखौं जमादार। जाँघे म राखौं लोहा के झार, पिण्डरी म राखौं सोखन वीर। उल्टन काया, पुल्टन वीर, हाँक देत हनुमन्ता छुटे। राजा राम के परे दोहाई, हनुमान के पीड़ा चौकी। कीर करे बीट बिरा करे, मोहिनी-जोहिनी सातों बहिनी। मोह देबे जोह देबे, चलत म परिहारिन मोहों। मोहों बन के हाथी, बत्तीस मन्दिर के दरबार मोहों। हाँक परे भिरहा मोहिनी के जाय, चेत सम्हार के। सत गुरु साहेब।”
विधि- उक्त मन्त्र स्वयं सिद्ध है तथा एक सज्जन के द्वारा अनुभूत बतलाया गया है। फिर भी शुभ समय में १०८ बार जपने से विशेष फलदायी होता है। नारियल, नींबू, अगर-बत्ती, सिन्दूर और गुड़ का भोग लगाकर १०८ बार मन्त्र जपे।
मन्त्र का प्रयोग कोर्ट-कचहरी, मुकदमा-विवाद, आपसी कलह, शत्रु-वशीकरण, नौकरी-इण्टरव्यू, उच्च अधीकारियों से सम्पर्क करते समय करे। उक्त मन्त्र को पढ़ते हुए इस प्रकार जाँए कि मन्त्र की समाप्ति ठीक इच्छित व्यक्ति के सामने हो।
२॰ शूकर-दन्त वशीकरण मन्त्र
“ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं वाराह-दन्ताय भैरवाय नमः।”
विधि- ‘शूकर-दन्त’ को अपने सामने रखकर उक्त मन्त्र का होली, दीपावली, दशहरा आदि में १०८ बार जप करे। फिर इसका ताबीज बनाकर गले में पहन लें। ताबीज धारण करने वाले पर जादू-टोना, भूत-प्रेत का प्रभाव नहीं होगा। लोगों का वशीकरण होगा। मुकदमें में विजय प्राप्ति होगी। रोगी ठीक होने लगेगा। चिन्ताएँ दूर होंगी और शत्रु परास्त होंगे। व्यापार में वृद्धि होगी।
३॰ कामिया सिन्दूर-मोहन मन्त्र-
“हथेली में हनुमन्त बसै, भैरु बसे कपार।
नरसिंह की मोहिनी, मोहे सब संसार।
मोहन रे मोहन्ता वीर, सब वीरन में तेरा सीर।
सबकी नजर बाँध दे, तेल सिन्दूर चढ़ाऊँ तुझे।
तेल सिन्दूर कहाँ से आया ? कैलास-पर्वत से आया।
कौन लाया, अञ्जनी का हनुमन्त, गौरी का गनेश लाया।
काला, गोरा, तोतला-तीनों बसे कपार।
बिन्दा तेल सिन्दूर का, दुश्मन गया पाताल।
दुहाई कमिया सिन्दूर की, हमें देख शीतल हो जाए।
सत्य नाम, आदेश गुरु की। सत् गुरु, सत् कबीर।
विधि- आसाम के ‘काम-रुप कामाख्या, क्षेत्र में ‘कामीया-सिन्दूर’ पाया जाता है। इसे प्राप्त कर लगातार सात रविवार तक उक्त मन्त्र का १०८ बार जप करें। इससे मन्त्र सिद्ध हो जाएगा। प्रयोग के समय ‘कामिया सिन्दूर’ पर ७ बार उक्त मन्त्र पढ़कर अपने माथे पर टीका लगाए। ‘टीका’ लगाकर जहाँ जाएँगे, सभी वशीभूत होंगे।
आकर्षण एवं वशीकरण के प्रबल सूर्य मन्त्र
१॰ “ॐ नमो भगवते श्रीसूर्याय ह्रीं सहस्त्र-किरणाय ऐं अतुल-बल-पराक्रमाय नव-ग्रह-दश-दिक्-पाल-लक्ष्मी-देव-वाय, धर्म-कर्म-सहितायै ‘अमुक’ नाथय नाथय, मोहय मोहय, आकर्षय आकर्षय, दासानुदासं कुरु-कुरु, वश कुरु-कुरु स्वाहा।”
विधि- सुर्यदेव का ध्यान करते हुए उक्त मन्त्र का १०८ बार जप प्रतिदिन ९ दिन तक करने से ‘आकर्षण’ का कार्य सफल होता है।
२॰ “ऐं पिन्स्थां कलीं काम-पिशाचिनी शिघ्रं ‘अमुक’ ग्राह्य ग्राह्य, कामेन मम रुपेण वश्वैः विदारय विदारय, द्रावय द्रावय, प्रेम-पाशे बन्धय बन्धय, ॐ श्रीं फट्।”
विधि- उक्त मन्त्र को पहले पर्व, शुभ समय में २०००० जप कर सिद्ध कर लें। प्रयोग के समय ‘साध्य’ के नाम का स्मरण करते हुए प्रतिदिन १०८ बार मन्त्र जपने से ‘वशीकरण’ हो जाता है।
बजरङग वशीकरण मन्त्र
“ॐ पीर बजरङ्गी, राम लक्ष्मण के सङ्गी। जहां-जहां जाए, फतह के डङ्के बजाय। ‘अमुक’ को मोह के, मेरे पास न लाए, तो अञ्जनी का पूत न कहाय। दुहाई राम-जानकी की।”
विधि- ११ दिनों तक ११ माला उक्त मन्त्र का जप कर इसे सिद्ध कर ले। ‘राम-नवमी’ या ‘हनुमान-जयन्ती’ शुभ दिन है। प्रयोग के समय दूध या दूध निर्मित पदार्थ पर ११ बार मन्त्र पढ़कर खिला या पिला देने से, वशीकरण होगा।
आकर्षण हेतु हनुमद्-मन्त्र-तन्त्र
“ॐ अमुक-नाम्ना ॐ नमो वायु-सूनवे झटिति आकर्षय-आकर्षय स्वाहा।”
विधि- केसर, कस्तुरी, गोरोचन, रक्त-चन्दन, श्वेत-चन्दन, अम्बर, कर्पूर और तुलसी की जड़ को घिस या पीसकर स्याही बनाए। उससे द्वादश-दल-कलम जैसा ‘यन्त्र’ लिखकर उसके मध्य में, जहाँ पराग रहता है, उक्त मन्त्र को लिखे। ‘अमुक’ के स्थान पर ‘साध्य’ का नाम लिखे। बारह दलों में क्रमशः निम्न मन्त्र लिखे- १॰ हनुमते नमः, २॰ अञ्जनी-सूनवे नमः, ३॰ वायु-पुत्राय नमः, ४॰ महा-बलाय नमः, ५॰ श्रीरामेष्टाय नमः, ६॰ फाल्गुन-सखाय नमः, ७॰ पिङ्गाक्षाय नमः, ८॰ अमित-विक्रमाय नमः, ९॰ उदधि-क्रमणाय नमः, १०॰ सीता-शोक-विनाशकाय नमः, ११॰ लक्ष्मण-प्राण-दाय नमः और १२॰ दश-मुख-दर्प-हराय नमः।
यन्त्र की प्राण-प्रतिष्ठा करके षोडशोपचार पूजन करते हुए उक्त मन्त्र का ११००० जप करें। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए लाल चन्दन या तुलसी की माला से जप करें। आकर्षण हेतु अति प्रभावकारी है।
वशीकरण हेतु कामदेव मन्त्र
“ॐ नमः काम-देवाय। सहकल सहद्रश सहमसह लिए वन्हे धुनन जनममदर्शनं उत्कण्ठितं कुरु कुरु, दक्ष दक्षु-धर कुसुम-वाणेन हन हन स्वाहा।”
विधि- कामदेव के उक्त मन्त्र को तीनों काल, एक-एक माला, एक मास तक जपे, तो सिद्ध हो जायेगा। प्रयोग करते समय जिसे देखकर जप करेंगे, वही वश में होगा।
प्रेमी-प्रेमिका वशीकरण मंत्र (Premi premika vashikaran mantra)
'कामाख्या देश कामाख्या देवी,
जहॉं बसे इस्माइल जोगी,
इस्माइल जोगी ने लगाई फुलवारी,
फूल तोडे लोना चमारी,
जो इस फूल को सूँघे बास,
तिस का मन रहे हमारे पास,
महल छोडे, घर छोडे, आँगन छोडे,
लोक कुटुम्ब की लाज छोडे,
दुआई लोना चमारी की,
धनवन्तरि की दुहाई फिरै।'
''किसी भी शनिवार से शुरू करके 31 दिनों तक नित्य 1144 बार मंत्र का जाप करें तथा लोबान, दीप और शराब रखें, फिर किसी फूल को 50 बार अभिमंत्रित करके स्त्री को दे दें। वह उस फूल को सूँघते ही वश में हो जाएगी।''
____________________________________________________________________________________________
ऐं पिन्स्थां कलीं काम-पिशाचिनी शिघ्रं ‘अमुक’ ग्राह्य ग्राह्य, कामेन मम रुपेण वश्वैः विदारय विदारय, द्रावय द्रावय, प्रेम-पाशे बन्धय बन्धय, ॐ श्रीं फट्।”
विधि- उक्त मन्त्र को पहले पर्व, शुभ समय में २०००० जप कर सिद्ध कर लें। प्रयोग के समय ‘साध्य’ के नाम का स्मरण करते हुए प्रतिदिन १०८ बार मन्त्र जपने से ‘वशीकरण’ हो जाता है
सफेद गुंजा की जड़ को घिस कर माथे पर तिलक लगाने से सभी लोग वशीभूत हो जाते हैं।
यदि सूर्य ग्रहण के समय सहदेवी की जड़ और सफेद चंदन को घिस कर व्यक्ति तिलक करे तो देखने वाली स्त्री वशीभूत हो जाएगी।
राई और प्रियंगु को ÷ह्रीं' मंत्र द्वारा अभिमंत्रित करके किसी स्त्री के ऊपर डाल दें तो वह वश में हो जाएगी।
शनिवार के दिन सुंदर आकृति वाली एक पुतली बनाकर उसके पेट पर इच्छित स्त्री का नाम लिखकर उसी को दिखाएं जिसका नाम लिखा है। फिर उस पुतली को छाती से लगाकर रखें। इससे स्त्री वशीभूत हो जाएगी।
बिजौरे की जड़ और धतूरे के बीज को प्याज के साथ पीसकर जिसे सुंघाया जाए वह वशीभूत हो जाएगा।
नागकेसर को खरल में कूट छान कर शुद्ध घी में मिलाकर यह लेप माथे पर लगाने से वशीकरण की शक्ति उत्पन्न हो जाती है।
नागकेसर, चमेली के फूल, कूट, तगर, कुंकुंम और देशी घी का मिश्रण बनाकर किसी प्याली में रख दें। लगातार कुछ दिनों तक नियमित रूप से इसका तिलक लगाते रहने से वशीकरण की शक्ति उत्पन्न हो जाती है।
शुभ दिन एवं शुभ लग्न में सूर्योदय के पश्चात उत्तर की ओर मुंह करके मूंगे की माला से निम्न मंत्र का जप शुरू करें। ३१ दिनों तक ३ माला का जप करने से मंत्र सिद्ध हो जाता है। मंत्र सिद्ध करके वशीकरण तंत्र की किसी भी वस्तु को टोटके के समय इसी मंत्र से २१ बार अभिमंत्रित करके इच्छित व्यक्ति पर प्रयोग करें। अमुक के स्थान पर इच्छित व्यक्ति का नाम बोलें। वह व्यक्ति आपके वश में हो जाएगा। मंत्र इस प्रकार है -
ऊँ नमो भास्कराय त्रिलोकात्मने अमुक महीपति मे वश्यं कुरू कुरू स्वाहा।
रवि पुष्य योग (रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र) में गूलर के फूल एवं कपास की रूई मिलाकर बत्ती बनाएं तथा उस बत्ती को मक्खन से जलाएं। फिर जलती हुई बत्ती की ज्वाला से काजल निकालें। इस काजल को रात में अपनी आंखें में लगाने से समस्त जग वश में हो जाता है। ऐसा काजल किसी को नहीं देना चाहिए।
अनार के पंचांग में सफेद घुघची मिला-पीसकर तिलक लगाने से समस्त संसार वश में हो जाता है।
कड़वी तूंबी (लौकी) के तेल और कपड़े की बत्ती से काजल तैयार करें। इसे आंखों में लगाकर देखने से वशीकरण हो जाता है।
बिल्व पत्रों को छाया में सुखाकर कपिला गाय के दूध में पीस लें। इसका तिलक करके साधक जिसके पास जाता है, वह वशीभूत हो जाता है।
कपूर तथा मैनसिल को केले के रस में पीसकर तिलक लगाने से साधक को जो भी देखता है, वह वशीभूत हो जाता है।
केसर, सिंदूर और गोरोचन तीनों को आंवले के साथ पीसकर तिलक लगाने से देखने वाले वशीभूत हो जाते हैं।
श्मशान में जहां अन्य पेड़ पौधे न हों, वहां लाल गुलाब का पौधा लगा दें। इसका फूल पूर्णमासी की रात को ले आएं। जिसे यह फूल देंगे, वह वशीभूत हो जाएगा। शत्रु के सामने यह फूल लगाकर जाने पर वह अहित नहीं करेगा।
अमावस्या की रात्रि को मिट्टी की एक कच्ची हंडिया मंगाकर उसके भीतर सूजी का हलवा रख दें। इसके अलावा उसमें साबुत हल्दी का एक टुकड़ा, ७ लौंग तथा ७ काली मिर्च रखकर हंडिया पर लाल कपड़ा बांध दें। फिर घर से कहीं दूर सुनसान स्थान पर वह हंडिया धरती में गाड़ दें और वापस आकर अपने हाथ-पैर धो लें। ऐसा करने से प्रबल वशीकरण होता है।
प्रातःकाल काली हल्दी का तिलक लगाएं। तिलक के मध्य में अपनी कनिष्ठिका उंगली का रक्त लगाने से प्रबल वशीकरण होता है।
कौए और उल्लू की विष्ठा को एक साथ मिलाकर गुलाब जल में घोटें तथा उसका तिलक माथे पर लगाएं। अब जिस स्त्री के सम्मुख जाएगा, वह सम्मोहित होकर जान तक न्योछावर करने को उतावली हो जाएगी।
उपाय !
१. यदि शत्रु अनावश्यक परेशान कर रहा हो तो भोजपत्र का टुकड़ा लेकर उस पर लाल चंदन से शत्रु का नाम लिखकर शहद की डिब्बी में डुबोकर रख दें। शत्रु वश में आ जाएगा।
२. काले कमल, भवरें के दोनों पंख, पुष्कर मूल, श्वेत काकजंघा - इन सबको पीसकर सुखाकर चूर्ण बनाकर जिस पर डाले वह वशीभूत होगा।
३. छोटी इलायची, लाल चंदन, सिंदूर, कंगनी , काकड़सिंगी आदि सारी सामग्री को इक्ट्ठा कर धूप बना दें व जिस किसी स्त्री के सामने धूप देगें वह वशीभूत होगी।
४. काकजंघा, तगर, केसर इन सबको पीसकर स्त्री के मस्तक पर तथा पैर के नीचे डालने पर वह वशीभूत होती है।
५. तगर, कूठ, हरताल व केसर इनको समान भाग में लेकर अनामिका अंगुली के रक्त में पीसकर तिलक लगाकर जिसके सम्मुख आएंगे वह वशीभूत हो जाएगा। ज्यादातर सभावशीकरण करने के लिए यह प्रयोग किया जाता है।
६. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में अनार की लकड़ी तोड़कर लाएं व धूप देकर उसे अपनी दांयी भुजा में बांध लें तो प्रत्येक व्यक्ति वशीभूत होगा।
७. शुक्ल पक्ष के रविवार को ५ लौंग शरीर में ऐसे स्थान पर रखें जहां पसीना आता हो व इसे सुखाकर चूर्ण बनाकर दूध, चाय में डालकर जिस किसी को पिला दी जाए तो वह वश में हो जाता है।
८. पीली हल्दी, घी (गाय का), गौमूत्र, सरसों व पान के रस को एक साथ पीसकर शरीर पर लगाने से स्त्रियां वश में हो जाती है।
९. बैजयंति माला धारण करने से शत्रु भी मित्रवत व्यवहार करने लगते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने यह माला पहनी हुई थी व उन्हें यह अतिप्रिय थी व उनमें सबको मोहित करने की अद्भुत क्षमता भी थी।
१०. कई बार पति किसी दूसरी स्त्री के चंगुल में आ जाता है तो अपनी गृहस्थी बचाने के लिए स्त्रियां यह प्रयोग कर सकती हैं। गुरुवार रात १२ बजे पति के थोड़े से बाल काटकर जला दें व बाद में पैर से मसल दें अवश्य ही जल्दी ही पति सुधर जाएगा।
११. कनेर पुष्प व गौघृत दोनों को मिलाकर, वशीकरण यंत्र रखें व आकर्षण मंत्र का जप करें। जिसका नाम लेकर १०८ बार जप करेंगे तो वह सात दिन के अंदर वशीभूत हो जाएगा।
२. श्वेत अपामार्ग की जड़ को घिसकर तिलक करने से सम्मोहन शक्ति बढ़ती है।
३. स्त्रियां अपने मस्तक पर आंखों के मध्य एक लाल बिंदी लगाकर उसे देखने का प्रयास करें। यदि कुछ समय बाद बिंदी खुद को दिखने लगे तो समझ लें कि आपमें सम्मोहन शक्ति जागृत हो गई है।
४. गुरुवार को मूल नक्षत्र में केले की जड़ को सिंदूर में मिलाकर पीस कर रोजाना तिलक करने से आकर्षण शक्ति बढ़ती है।
५. गेंदे का फूल, पूजा की थाली में रखकर हल्दी के कुछ छींटे मारें व गंगा जल के साथ पीसकर माथे पर तिलक लगाएं आकर्षण शक्ति बढ़ती है।
६. कई बार आपको यदि ऐसा लगता है कि परेशानियां व समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। धन का आगमन रुक गया है या आप पर किसी द्वारा तांत्रिक अभिकर्म'' किया गया है तो आप यह टोटके अवश्य प्रयोग करें, आपको इनका प्रभाव जल्दी ही प्राप्त होगा।
तांत्रिक अभिकर्म से प्रतिरक्षण हेतु उपाय
१. पीली सरसों, गुग्गल, लोबान व गौघृत इन सबको मिलाकर इनकी धूप बना लें व सूर्यास्त के 1 घंटे भीतर उपले जलाकर उसमें डाल दें। ऐसा २१ दिन तक करें व इसका धुआं पूरे घर में करें। इससे नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं।
२. जावित्री, गायत्री व केसर लाकर उनको कूटकर गुग्गल मिलाकर धूप बनाकर सुबह शाम २१ दिन तक घर में जलाएं। धीरे-धीरे तांत्रिक अभिकर्म समाप्त होगा।
३. गऊ, लोचन व तगर थोड़ी सी मात्रा में लाकर लाल कपड़े में बांधकर अपने घर में पूजा स्थान में रख दें। शिव कृपा से तमाम टोने-टोटके का असर समाप्त हो जाएगा।
४. घर में साफ सफाई रखें व पीपल के पत्ते से ७ दिन तक घर में गौमूत्र के छींटे मारें व तत्पश्चात् शुद्ध गुग्गल का धूप जला दें।
५. कई बार ऐसा होता है कि शत्रु आपकी सफलता व तरक्की से चिढ़कर तांत्रिकों द्वारा अभिचार कर्म करा देता है। इससे व्यवसाय बाधा एवं गृह क्लेश होता है अतः इसके दुष्प्रभाव से बचने हेतु सवा 1 किलो काले उड़द, सवा 1 किलो कोयला को सवा 1 मीटर काले कपड़े में बांधकर अपने ऊपर से २१ बार घुमाकर शनिवार के दिन बहते जल में विसर्जित करें व मन में हनुमान जी का ध्यान करें। ऐसा लगातार ७ शनिवार करें। तांत्रिक अभिकर्म पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा।
६. यदि आपको ऐसा लग रहा हो कि कोई आपको मारना चाहता है तो पपीते के २१ बीज लेकर शिव मंदिर जाएं व शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाकर धूप बत्ती करें तथा शिवलिंग के निकट बैठकर पपीते के बीज अपने सामने रखें। अपना नाम, गौत्र उच्चारित करके भगवान् शिव से अपनी रक्षा की गुहार करें व एक माला महामृत्युंजय मंत्र की जपें तथा बीजों को एकत्रित कर तांबे के ताबीज में भरकर गले में धारण कर लें।
७. शत्रु अनावश्यक परेशान कर रहा हो तो नींबू को ४ भागों में काटकर चौराहे पर खड़े होकर अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए चारों दिशाओं में एक-एक भाग को फेंक दें व घर आकर अपने हाथ-पांव धो लें। तांत्रिक अभिकर्म से छुटकारा मिलेगा।
८. शुक्ल पक्ष के बुधवार को ४ गोमती चक्र अपने सिर से घुमाकर चारों दिशाओं में फेंक दें तो व्यक्ति पर किए गए तांत्रिक अभिकर्म का प्रभाव खत्म हो जाता है।
सिद्ध वशीकरण मन्त्र
१॰ “बारा राखौ, बरैनी, मूँह म राखौं कालिका। चण्डी म राखौं मोहिनी, भुजा म राखौं जोहनी। आगू म राखौं सिलेमान, पाछे म राखौं जमादार। जाँघे म राखौं लोहा के झार, पिण्डरी म राखौं सोखन वीर। उल्टन काया, पुल्टन वीर, हाँक देत हनुमन्ता छुटे। राजा राम के परे दोहाई, हनुमान के पीड़ा चौकी। कीर करे बीट बिरा करे, मोहिनी-जोहिनी सातों बहिनी। मोह देबे जोह देबे, चलत म परिहारिन मोहों। मोहों बन के हाथी, बत्तीस मन्दिर के दरबार मोहों। हाँक परे भिरहा मोहिनी के जाय, चेत सम्हार के। सत गुरु साहेब।”
विधि- उक्त मन्त्र स्वयं सिद्ध है तथा एक सज्जन के द्वारा अनुभूत बतलाया गया है। फिर भी शुभ समय में १०८ बार जपने से विशेष फलदायी होता है। नारियल, नींबू, अगर-बत्ती, सिन्दूर और गुड़ का भोग लगाकर १०८ बार मन्त्र जपे।
मन्त्र का प्रयोग कोर्ट-कचहरी, मुकदमा-विवाद, आपसी कलह, शत्रु-वशीकरण, नौकरी-इण्टरव्यू, उच्च अधीकारियों से सम्पर्क करते समय करे। उक्त मन्त्र को पढ़ते हुए इस प्रकार जाँए कि मन्त्र की समाप्ति ठीक इच्छित व्यक्ति के सामने हो।
२॰ शूकर-दन्त वशीकरण मन्त्र
“ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं वाराह-दन्ताय भैरवाय नमः।”
विधि- ‘शूकर-दन्त’ को अपने सामने रखकर उक्त मन्त्र का होली, दीपावली, दशहरा आदि में १०८ बार जप करे। फिर इसका ताबीज बनाकर गले में पहन लें। ताबीज धारण करने वाले पर जादू-टोना, भूत-प्रेत का प्रभाव नहीं होगा। लोगों का वशीकरण होगा। मुकदमें में विजय प्राप्ति होगी। रोगी ठीक होने लगेगा। चिन्ताएँ दूर होंगी और शत्रु परास्त होंगे। व्यापार में वृद्धि होगी।
३॰ कामिया सिन्दूर-मोहन मन्त्र-
“हथेली में हनुमन्त बसै, भैरु बसे कपार।
नरसिंह की मोहिनी, मोहे सब संसार।
मोहन रे मोहन्ता वीर, सब वीरन में तेरा सीर।
सबकी नजर बाँध दे, तेल सिन्दूर चढ़ाऊँ तुझे।
तेल सिन्दूर कहाँ से आया ? कैलास-पर्वत से आया।
कौन लाया, अञ्जनी का हनुमन्त, गौरी का गनेश लाया।
काला, गोरा, तोतला-तीनों बसे कपार।
बिन्दा तेल सिन्दूर का, दुश्मन गया पाताल।
दुहाई कमिया सिन्दूर की, हमें देख शीतल हो जाए।
सत्य नाम, आदेश गुरु की। सत् गुरु, सत् कबीर।
विधि- आसाम के ‘काम-रुप कामाख्या, क्षेत्र में ‘कामीया-सिन्दूर’ पाया जाता है। इसे प्राप्त कर लगातार सात रविवार तक उक्त मन्त्र का १०८ बार जप करें। इससे मन्त्र सिद्ध हो जाएगा। प्रयोग के समय ‘कामिया सिन्दूर’ पर ७ बार उक्त मन्त्र पढ़कर अपने माथे पर टीका लगाए। ‘टीका’ लगाकर जहाँ जाएँगे, सभी वशीभूत होंगे।
आकर्षण एवं वशीकरण के प्रबल सूर्य मन्त्र
१॰ “ॐ नमो भगवते श्रीसूर्याय ह्रीं सहस्त्र-किरणाय ऐं अतुल-बल-पराक्रमाय नव-ग्रह-दश-दिक्-पाल-लक्ष्मी-देव-वाय, धर्म-कर्म-सहितायै ‘अमुक’ नाथय नाथय, मोहय मोहय, आकर्षय आकर्षय, दासानुदासं कुरु-कुरु, वश कुरु-कुरु स्वाहा।”
विधि- सुर्यदेव का ध्यान करते हुए उक्त मन्त्र का १०८ बार जप प्रतिदिन ९ दिन तक करने से ‘आकर्षण’ का कार्य सफल होता है।
२॰ “ऐं पिन्स्थां कलीं काम-पिशाचिनी शिघ्रं ‘अमुक’ ग्राह्य ग्राह्य, कामेन मम रुपेण वश्वैः विदारय विदारय, द्रावय द्रावय, प्रेम-पाशे बन्धय बन्धय, ॐ श्रीं फट्।”
विधि- उक्त मन्त्र को पहले पर्व, शुभ समय में २०००० जप कर सिद्ध कर लें। प्रयोग के समय ‘साध्य’ के नाम का स्मरण करते हुए प्रतिदिन १०८ बार मन्त्र जपने से ‘वशीकरण’ हो जाता है।
बजरङग वशीकरण मन्त्र
“ॐ पीर बजरङ्गी, राम लक्ष्मण के सङ्गी। जहां-जहां जाए, फतह के डङ्के बजाय। ‘अमुक’ को मोह के, मेरे पास न लाए, तो अञ्जनी का पूत न कहाय। दुहाई राम-जानकी की।”
विधि- ११ दिनों तक ११ माला उक्त मन्त्र का जप कर इसे सिद्ध कर ले। ‘राम-नवमी’ या ‘हनुमान-जयन्ती’ शुभ दिन है। प्रयोग के समय दूध या दूध निर्मित पदार्थ पर ११ बार मन्त्र पढ़कर खिला या पिला देने से, वशीकरण होगा।
आकर्षण हेतु हनुमद्-मन्त्र-तन्त्र
“ॐ अमुक-नाम्ना ॐ नमो वायु-सूनवे झटिति आकर्षय-आकर्षय स्वाहा।”
विधि- केसर, कस्तुरी, गोरोचन, रक्त-चन्दन, श्वेत-चन्दन, अम्बर, कर्पूर और तुलसी की जड़ को घिस या पीसकर स्याही बनाए। उससे द्वादश-दल-कलम जैसा ‘यन्त्र’ लिखकर उसके मध्य में, जहाँ पराग रहता है, उक्त मन्त्र को लिखे। ‘अमुक’ के स्थान पर ‘साध्य’ का नाम लिखे। बारह दलों में क्रमशः निम्न मन्त्र लिखे- १॰ हनुमते नमः, २॰ अञ्जनी-सूनवे नमः, ३॰ वायु-पुत्राय नमः, ४॰ महा-बलाय नमः, ५॰ श्रीरामेष्टाय नमः, ६॰ फाल्गुन-सखाय नमः, ७॰ पिङ्गाक्षाय नमः, ८॰ अमित-विक्रमाय नमः, ९॰ उदधि-क्रमणाय नमः, १०॰ सीता-शोक-विनाशकाय नमः, ११॰ लक्ष्मण-प्राण-दाय नमः और १२॰ दश-मुख-दर्प-हराय नमः।
यन्त्र की प्राण-प्रतिष्ठा करके षोडशोपचार पूजन करते हुए उक्त मन्त्र का ११००० जप करें। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए लाल चन्दन या तुलसी की माला से जप करें। आकर्षण हेतु अति प्रभावकारी है।
वशीकरण हेतु कामदेव मन्त्र
“ॐ नमः काम-देवाय। सहकल सहद्रश सहमसह लिए वन्हे धुनन जनममदर्शनं उत्कण्ठितं कुरु कुरु, दक्ष दक्षु-धर कुसुम-वाणेन हन हन स्वाहा।”
विधि- कामदेव के उक्त मन्त्र को तीनों काल, एक-एक माला, एक मास तक जपे, तो सिद्ध हो जायेगा। प्रयोग करते समय जिसे देखकर जप करेंगे, वही वश में होगा।
प्रेमी-प्रेमिका वशीकरण मंत्र (Premi premika vashikaran mantra)
'कामाख्या देश कामाख्या देवी,
जहॉं बसे इस्माइल जोगी,
इस्माइल जोगी ने लगाई फुलवारी,
फूल तोडे लोना चमारी,
जो इस फूल को सूँघे बास,
तिस का मन रहे हमारे पास,
महल छोडे, घर छोडे, आँगन छोडे,
लोक कुटुम्ब की लाज छोडे,
दुआई लोना चमारी की,
धनवन्तरि की दुहाई फिरै।'
''किसी भी शनिवार से शुरू करके 31 दिनों तक नित्य 1144 बार मंत्र का जाप करें तथा लोबान, दीप और शराब रखें, फिर किसी फूल को 50 बार अभिमंत्रित करके स्त्री को दे दें। वह उस फूल को सूँघते ही वश में हो जाएगी।''
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ऐं पिन्स्थां कलीं काम-पिशाचिनी शिघ्रं ‘अमुक’ ग्राह्य ग्राह्य, कामेन मम रुपेण वश्वैः विदारय विदारय, द्रावय द्रावय, प्रेम-पाशे बन्धय बन्धय, ॐ श्रीं फट्।”
विधि- उक्त मन्त्र को पहले पर्व, शुभ समय में २०००० जप कर सिद्ध कर लें। प्रयोग के समय ‘साध्य’ के नाम का स्मरण करते हुए प्रतिदिन १०८ बार मन्त्र जपने से ‘वशीकरण’ हो जाता है
सफेद गुंजा की जड़ को घिस कर माथे पर तिलक लगाने से सभी लोग वशीभूत हो जाते हैं।
यदि सूर्य ग्रहण के समय सहदेवी की जड़ और सफेद चंदन को घिस कर व्यक्ति तिलक करे तो देखने वाली स्त्री वशीभूत हो जाएगी।
राई और प्रियंगु को ÷ह्रीं' मंत्र द्वारा अभिमंत्रित करके किसी स्त्री के ऊपर डाल दें तो वह वश में हो जाएगी।
शनिवार के दिन सुंदर आकृति वाली एक पुतली बनाकर उसके पेट पर इच्छित स्त्री का नाम लिखकर उसी को दिखाएं जिसका नाम लिखा है। फिर उस पुतली को छाती से लगाकर रखें। इससे स्त्री वशीभूत हो जाएगी।
बिजौरे की जड़ और धतूरे के बीज को प्याज के साथ पीसकर जिसे सुंघाया जाए वह वशीभूत हो जाएगा।
नागकेसर को खरल में कूट छान कर शुद्ध घी में मिलाकर यह लेप माथे पर लगाने से वशीकरण की शक्ति उत्पन्न हो जाती है।
नागकेसर, चमेली के फूल, कूट, तगर, कुंकुंम और देशी घी का मिश्रण बनाकर किसी प्याली में रख दें। लगातार कुछ दिनों तक नियमित रूप से इसका तिलक लगाते रहने से वशीकरण की शक्ति उत्पन्न हो जाती है।
शुभ दिन एवं शुभ लग्न में सूर्योदय के पश्चात उत्तर की ओर मुंह करके मूंगे की माला से निम्न मंत्र का जप शुरू करें। ३१ दिनों तक ३ माला का जप करने से मंत्र सिद्ध हो जाता है। मंत्र सिद्ध करके वशीकरण तंत्र की किसी भी वस्तु को टोटके के समय इसी मंत्र से २१ बार अभिमंत्रित करके इच्छित व्यक्ति पर प्रयोग करें। अमुक के स्थान पर इच्छित व्यक्ति का नाम बोलें। वह व्यक्ति आपके वश में हो जाएगा। मंत्र इस प्रकार है -
ऊँ नमो भास्कराय त्रिलोकात्मने अमुक महीपति मे वश्यं कुरू कुरू स्वाहा।
रवि पुष्य योग (रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र) में गूलर के फूल एवं कपास की रूई मिलाकर बत्ती बनाएं तथा उस बत्ती को मक्खन से जलाएं। फिर जलती हुई बत्ती की ज्वाला से काजल निकालें। इस काजल को रात में अपनी आंखें में लगाने से समस्त जग वश में हो जाता है। ऐसा काजल किसी को नहीं देना चाहिए।
अनार के पंचांग में सफेद घुघची मिला-पीसकर तिलक लगाने से समस्त संसार वश में हो जाता है।
कड़वी तूंबी (लौकी) के तेल और कपड़े की बत्ती से काजल तैयार करें। इसे आंखों में लगाकर देखने से वशीकरण हो जाता है।
बिल्व पत्रों को छाया में सुखाकर कपिला गाय के दूध में पीस लें। इसका तिलक करके साधक जिसके पास जाता है, वह वशीभूत हो जाता है।
कपूर तथा मैनसिल को केले के रस में पीसकर तिलक लगाने से साधक को जो भी देखता है, वह वशीभूत हो जाता है।
केसर, सिंदूर और गोरोचन तीनों को आंवले के साथ पीसकर तिलक लगाने से देखने वाले वशीभूत हो जाते हैं।
श्मशान में जहां अन्य पेड़ पौधे न हों, वहां लाल गुलाब का पौधा लगा दें। इसका फूल पूर्णमासी की रात को ले आएं। जिसे यह फूल देंगे, वह वशीभूत हो जाएगा। शत्रु के सामने यह फूल लगाकर जाने पर वह अहित नहीं करेगा।
अमावस्या की रात्रि को मिट्टी की एक कच्ची हंडिया मंगाकर उसके भीतर सूजी का हलवा रख दें। इसके अलावा उसमें साबुत हल्दी का एक टुकड़ा, ७ लौंग तथा ७ काली मिर्च रखकर हंडिया पर लाल कपड़ा बांध दें। फिर घर से कहीं दूर सुनसान स्थान पर वह हंडिया धरती में गाड़ दें और वापस आकर अपने हाथ-पैर धो लें। ऐसा करने से प्रबल वशीकरण होता है।
प्रातःकाल काली हल्दी का तिलक लगाएं। तिलक के मध्य में अपनी कनिष्ठिका उंगली का रक्त लगाने से प्रबल वशीकरण होता है।
कौए और उल्लू की विष्ठा को एक साथ मिलाकर गुलाब जल में घोटें तथा उसका तिलक माथे पर लगाएं। अब जिस स्त्री के सम्मुख जाएगा, वह सम्मोहित होकर जान तक न्योछावर करने को उतावली हो जाएगी।
उपाय !
१. यदि शत्रु अनावश्यक परेशान कर रहा हो तो भोजपत्र का टुकड़ा लेकर उस पर लाल चंदन से शत्रु का नाम लिखकर शहद की डिब्बी में डुबोकर रख दें। शत्रु वश में आ जाएगा।
२. काले कमल, भवरें के दोनों पंख, पुष्कर मूल, श्वेत काकजंघा - इन सबको पीसकर सुखाकर चूर्ण बनाकर जिस पर डाले वह वशीभूत होगा।
३. छोटी इलायची, लाल चंदन, सिंदूर, कंगनी , काकड़सिंगी आदि सारी सामग्री को इक्ट्ठा कर धूप बना दें व जिस किसी स्त्री के सामने धूप देगें वह वशीभूत होगी।
४. काकजंघा, तगर, केसर इन सबको पीसकर स्त्री के मस्तक पर तथा पैर के नीचे डालने पर वह वशीभूत होती है।
५. तगर, कूठ, हरताल व केसर इनको समान भाग में लेकर अनामिका अंगुली के रक्त में पीसकर तिलक लगाकर जिसके सम्मुख आएंगे वह वशीभूत हो जाएगा। ज्यादातर सभावशीकरण करने के लिए यह प्रयोग किया जाता है।
६. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में अनार की लकड़ी तोड़कर लाएं व धूप देकर उसे अपनी दांयी भुजा में बांध लें तो प्रत्येक व्यक्ति वशीभूत होगा।
७. शुक्ल पक्ष के रविवार को ५ लौंग शरीर में ऐसे स्थान पर रखें जहां पसीना आता हो व इसे सुखाकर चूर्ण बनाकर दूध, चाय में डालकर जिस किसी को पिला दी जाए तो वह वश में हो जाता है।
८. पीली हल्दी, घी (गाय का), गौमूत्र, सरसों व पान के रस को एक साथ पीसकर शरीर पर लगाने से स्त्रियां वश में हो जाती है।
९. बैजयंति माला धारण करने से शत्रु भी मित्रवत व्यवहार करने लगते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने यह माला पहनी हुई थी व उन्हें यह अतिप्रिय थी व उनमें सबको मोहित करने की अद्भुत क्षमता भी थी।
१०. कई बार पति किसी दूसरी स्त्री के चंगुल में आ जाता है तो अपनी गृहस्थी बचाने के लिए स्त्रियां यह प्रयोग कर सकती हैं। गुरुवार रात १२ बजे पति के थोड़े से बाल काटकर जला दें व बाद में पैर से मसल दें अवश्य ही जल्दी ही पति सुधर जाएगा।
११. कनेर पुष्प व गौघृत दोनों को मिलाकर, वशीकरण यंत्र रखें व आकर्षण मंत्र का जप करें। जिसका नाम लेकर १०८ बार जप करेंगे तो वह सात दिन के अंदर वशीभूत हो जाएगा।
अपामार्ग का नाभी में उपयोग -अपामार्ग,वासा ,पाठा ,कनेर इनमें से किसी
एक औषधि की जड़ को स्त्री की नाभि,मूत्र प्रदेश या
योनि के आसपास लेपन करने मात्र से सुख-प्रसव होना विदित है …! ढोंढी । धुन्नी ।
तुन्नी । तुंदी । तुंदिका । तुंदकुपी ।
ा नाभी वनस्पति
वृक्ष
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